संघ के आशिर्वाद से नितिन गडकरी जब बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने तो ऐसा लगा कि वह पार्टी के भीतर उस सभ्याता और संस्कृति को कायम करेंगे, जिसका संघ हिमयती रहा है। उम्मीद थी की बीजेपी संघ की बनाई पगडंडी पर चल निकलेगी। लेकिन देश की मुख्य विपक्षी पार्टी का मुखिया अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदियों के लिए जिस तरह के जुमलों का इस्तेमाल क
र रहा है, उसे तो अब ये सवाल उठने लगा है कि क्या गडकरी इसी तरह की सभ्याता और संस्कृति के हिमायती हैं। नितिन गडकरी ने देहरादून में पार्टी की जनाक्रोश रैली में जिस तरह की अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल किया उसकी कल्पना कम से कम देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष से नहीं की जा सकती। रैली में कांग्रेस पर निशाना साधते हुए उन्होंने अफजल गुरु को कांग्रेस का दामाद कह डाला। अफजल के फांसी के मुद्दे पर गडकरी ने रैली में कहा , ' क्या अफजल कांग्रेस का जमाई है?' जो उसे फांसी नहीं दी जा रही है।
अकसर नेता अपने बयान के बाद उस पर सफाई देने और खुद को बचाने की कोशिश में लग जाते हैं, लेकिन गडकरी ने तो ऐसा कुछ नहीं किया, बल्कि इस बयान के ठीक दूसरे दिन बीजेपी अध्यक्ष ने क
हा कि उन्होंने जो कुछ भी कहा वो ठीक कहा था, लिहाजा मांफी मांगने का सवाल ही नहीं पैदा होता। यानी गडकरी ने जिसतरह के शब्दों का इस्तेमाल किया था वो गलती से उनकी जबान से नहीं निकला बल्कि सोच-समझ कर और नाप-तोल कर बोले गए शब्द थे। इसके बाद गडकरी ने लखनऊ में एक दूसरी रैली में कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह को औरंगजेब की औलाद बताया। गडकरी पहले भी अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदियों के खिलाफ अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करते रहे हैं। कुछ ही समय पहले गडकरी ने चंडीगढ़ में एक जनसभा के दौरान लालू यादव और मुलायम सिंह यादव को ‘कुत्ता’ कहा था। चंडीगढ़ में जनसभा को संबोधित करते हुए गडकरी ने दोनों नेताओं को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के तलुए चाटने वाले की संज्ञा दे डाली।
गडकरी ने राजनीति संघ के गर्भ में सीखी है। संघ ने बीजेपी में कई आला नेताओं को तरजीह देते हुए उन्हें पार्टी का अध्यक्ष बनाया था। ताकि संघ की विचारधारा को वो बीजेपी के माध्यम से आगे बढ़ाएं। लेकिन गडकरी जिस तरह की विचारधारा को परोस रहे हैं उसको लेकर इस बात का संदेह होने लगा है कि क्या ये संघ कि विचारधारा है या फिर गडकरी खुद ऐसे राजनीति के पैरोकार हैं। जिसमें गाली आम बात हो।