Thursday, July 23, 2009

क़ातिल पंचायत

कहते हैं पंच परमेश्वर होते हैं, लेकिन जातीय पंचायतों की तरफ से आने वाले फैसलों में पंच यमराज की भूमिका में नजर आते हैं। कभी जाति के नाम पर तो कभी गोत्र के नाम कातिल पंचायतें मौत का फरमान सुनाती है। जिंद और झज्जर के तालिबानी फैसले इसका नमुना भर हैं।...क़ैसर रज़ा
जिंद की पंचायत का फरमान लील गया वेद पाल को। वैसे तो उसके पास पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट का आदेश भी था....जिसमें सोनिया से उसकी शादी जायज थी....जिस पर जिंद की पंचायत ने पहले गोत्र की गोट फंसा दी थी। अदालत के फैसले से वेदपाल का हौसला बढ़ा.....वो अपनी बीबी को लेने अपनी ससुराल पहुंचा....पुलिस के कुछ जवान भी उसके साथ थे.......लेकिन पंचायत के आगे सब बेमानी हो गया। उसे पीट पीट कर मार डाला गया। वेदपाल की मौत से झज्जर का रविंद्र सहमा हुआ है। उसने भी अपने गोत्र की एक लड़की से शादी की है। पंचायत ने पहले शादी तोड़ने का फरमान सुनाया। जब रविन्द्र ने इससे इंकार कर दिया तब पंचायत ने उसे गांव से बेदखल करने का हुक्म दिया। पंचायत के फैसले से परेशान रविन्द्र ने जहर खा कर जान देने की कोशिश भी की। हरियाणा में गोत्र और परिवार के कथित सम्मान के नाम पर इस तरह की हत्याएं और पंचायती फरमान का सिलसिला काफी पुराना है। दूसरे राज्यों में भी जातीय पंचायतों का काफी दबदबा है। कोई पंचायत के फैसले के खिलाफ गया तो उसकी जान पर बन आती है। सरकार लगातार जाति पंचायतों के अस्तित्व को नकारती रही है लेकिन हकीकत सामने है। पंचायती फैसलों के आगे कानून और अदालत का कोई जोर नहीं चलता। दरअसल देश की ज्यादातर आबादी गांवों में रहती है। लोग कुनबे, जात-बिरादरी और कबीले में बटें हैं। पंचायत का फरमान इनके लिए सबसे उपर होता है। समाज और जातीय पंचायत मर्द-औरत की शादी को गोत्र के नाम पर कबूल करने को राजी नहीं है। वोट किसको देना है, प्यार किससे करें, शादी किससे करें, कौन बिरादरी में रहेगा, कौन नहीं- हर बात पर फतवा...फरमान। कदम कदम पर समाज के ठेकेदारों की मौजूदगी आम लोगों के हर काम में अडंगा लगाने को तैयार है। उन्हें लगता है कि बदलाव की एक बयार उनके समाज को उड़ा ले जाएगी। कभी कोई बाबू बजरंगी प्यार करने वालों को लाठी डंडों से समझाता है, कोई प्रमोद मुतालिक संस्कृति का हवाला देकर पब जाने वाली लड़कियों की पिटाई कराता है। कोई मौलाना फतवे के दम पर इस्लाम की दुहाई देता है, किसी गांव में पंचायत प्यार करने वालों को सूली पर चढ़ा देती है, कोई सरकार धर्म बदलने पर पाबंदी का कानून बनाती है। ऐसे में अब समलैंगिकों को कानूनी मान्यता देने की बात हो रही है। क्या समाज की मानसिकता इस नए बदलाव को कबूल कर पाएगी। बड़ा सवाल है। गांवों में पंचायती व्यवस्था लागू करने की मांग होती रही है। मगर पंचायती फैसलों के अनुभवों को देखते हुए पंचायती व्यवस्था का सापना कितना साकार हो पाएगा। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है।