1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से निकली चिंगारी ने, आज इतनी ताकत बटोर ली है कि वो सीधे सत्ता के प्रतिष्ठानों पर हमले करने लगी है। पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले में नेपाल सीमा से लगे एक छोटे से क
स्बे में जिस संघर्ष का बिगुल फूकां गया, उसका मकसद किसानों को उनका हक दिलाना था। असमानता और अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद करना था। उस वक्त कानू सान्याल ने कहा था कि सशस्त्र संघर्ष जमीन के लिए नहीं, राजसत्ता के लिए। लेकिन आज नक्सलवाद अपने मकसद से भटक गया है। उसके लिए राजसत्ता के मायने बेमानी हो गए हैं। वो लोकतंत्र के माहापर्व में हिस्सा लेने को तैयार नहीं है। उसे तो इस दिन खून की होली खेलना पसंद आन लगा है। नक्सली पिछले कई सालों से चुनाव बहिष्कार कर रहे हैं। यही वजह है कि चुनाव वक्त नक्सली वारदातों में इजाफा हो जाता है। इसबार भी जब से चुनावी मौसम आया है नक्सलियों ने हमले तेज कर दिए हैं। नक्सली हर बार चुनाव बहिष्कार करते हैं। जब चुनावों का मौसम होता है तब नक्सली दीवारों पर चुनाव बहिष्कार से जुड़े नारे लिखे जाते हैं। पर्चे बांट कर जनता से चुनाव बहिष्कार करने को कहा जाता है। इन पर्चों और पोस्टरों में ये धमकियां दी जाती हैं कि अगर किसी ने वोट देने की कोशिश की तो उसकी खैर नहीं। कई बार तो वोट देने वाले के अगूंठे और हाथ काट दिए जाने के मामले सामने आते रहे हैं। नक्सलियों और उग्रवादियों व अलगाववादियों में कोई फर्क नहीं है। जम्मूकश्मीर में अलगाववादी संगठन भी चुनाव का बहिष्कार करते रहें हैं। जबकि उत्तर पूर्व के राज्यो में कई उग्रवादी संगठन लोगों को चुनाव से दूर रहने की हिदायत देंते हैं। जबकि नक्सली भी उसी काम को करने में लगे हैं। हालांकि कुछ जानकारों का तर्क है कि अलगाववादी और उग्रवादियों की मंशा देश विरोधी होती है, जबकि नक्सली ऐसा नहीं करते। लेकिन हकीकत ये है कि अगर लाल गलियारा पूरी तरह वजूद में आ गया तो वो देश को कई टुकड़े में बांट देगा। नक्सलवाद का दायरा दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा है। केन्द्रीय गृहमंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक देश के पचपन से ज्यादा जिलों में नक्सलवाद ने अपने पांव फैला रखे हैं। जबकि गैर सरकारी संगठनों के मुताबिक नक्सलियों की पकड़ 132 जिलों में है। ये रेडकोरिडोर बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, झारखेड उड़ीसा, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु तक फैल गया है। आज सरकार के समानांतर नक्लियों की सत्ता चल रही है। इन्हें लोकतांत्रिक व्यवस्था में यकीन नहीं है। मौजूदा नकस्लवाद की मंशा गरीबों, मजलूमों और पिछड़ों को उनका हक दिलाने की नहीं बल्कि आतंक फैलाने की है।