बीजेपी ने चुनाव तारीखों के एलान से काफी पहले ही लालकृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया था, लेकिन चुनावी रणभेरी बजने के इतने दिनों बाद भी बीजेपी ने अपना घोषणा पत्र जारी नहीं किया है। आखिर इस देरी के पीछे असल वजह क्या है ? आईए जानते हैं।...
खाई दे रही है। इन बड़े मुद्दों के होते हुए भी वो असमंजस में है। पिछले दिनों नागपुर में हुए पार्टी अधिवेशन के दौरान राजनाथ सिंह ने संकेत दिए थे कि बीजेपी राममुद्दे को चुनावी मुद्दा बना सकती है। लेकिन बीजेपी इस मुद्दे के जरिए लोगों को कई बार से बरगलाती आई है। उसे पता है कि काठ की हांडी चूल्हे पर बार-बार नहीं चढ़ती। यही वजह है कि वो राम बाण के इस्तेमाल से बच रही है। जबकि बीजेपी पर सहयोगी दलों का दबाव भी है, खासकर जेडीयू ने साफ कर दिया है कि राममंदिर, धारा 370 और समान नागरिक संहिता का मुद्दा एनडीए के एजेंडे में नहीं है। बीजेपी राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद का मुद्दा उठाने में भी संकोच करती दिखाई दे रही है। क्योंकि संसद हमला, लालकिला हमला, कंधार विमान हाइजैकिंग और अक्षरधाम मंदिर हमले जैसे मुद्दों के जरिए वो खुद कटघरे में खड़ी दिखई देने लगती है। मंहगाई को बीजेपी मुद्दा बना सकती थी, लेकिन कमबख्त महंगाई दर भी काफी नीचे चली आई है, ऐसे में इसका भी फायदा बीजेपी को शायद ही मिल पाए। कांग्रेस ने कर्ज माफी कर किसानों की कर्ज माफी का मुद्दा भी बीजेपी से छीन लिया है। बीजेपी खुलकर परमाणु करार की खामिया भी नहीं गिना रही, क्योंकि उसकी और कांग्रेस की विदेश नीति में कोई खास फर्क नहीं है। और अगर वो भी सत्ता में होती तो यही करती जो कांग्रेस ने किया। यही वजह है कि बीजेपी ये कह कर परमाणु करार को मुद्दा नहीं बना रही है कि समझौता आम आदमी की चिंताओं से कोसो दूर है। ये तमाम ऐसे पेंच है जो बीजेपी के सामने मुश्किलें पैदा कर रहे हैं। ऐसे में बीजेपी किन मुद्दों के जरिए जनता के बीच जाए वो अब भी दुविधा में है।
सत्ता पाने को आतुर बीजेपी ने अबतक अपना चुनावी घोषणा पत्र जारी नहीं किया है। दरअसल बीजेपी के पास मुद्दों का टोटा है। बीजेपी अब तक ये तय नहीं कर पाई है कि वो किन मुद्दों के साथ चुनावी समर में कूदे। और किन मुद्दों के बिना पर वो कांग्रेस को घेरे। बीजेपी की रणनीति आतंकवाद, महंगाई और राम मंदिर मुद्दे के आसपास भटकती दि