Saturday, May 30, 2009

नस्लवाद का नासूर

पिछले कुछ दिनों से ऑस्ट्रेलिया में भरतीयों पर नस्लीय हमले हो रहे हैं। लिहाज अब भारत सरकार ने इस मसले को गंभीरता से लिया है। लेकिन ये कोई पहला मौका नहीं जब पश्चिमि देशों में रहे रहे भरतीयों के साथ नस्लीय भेदभाव का मामला सामने आया हो, बल्कि ऐसे मामलों की एक लंबी फेहरिस्त है। ...क़ैसर रज़ा

आज दुनिया ने ग्लोबल विलेज की शक्ल अख्तियार कर ली है। फिर भी पश्चिमि देशों की मानसिकता भारतीयों के प्रति नहीं बदली। आज भी भारतीयों के साथ नस्लभेद हो रह है। ऑस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों पर हुए ताजा हमले इस बात के उदहारण हैं। वहीं एक बार फिर फ्रांस एयरलाइन के 10 मुसाफिरों को नस्लवादी भेदभाव का शिकार होना पड़ा है। वॉशिंगटन से पैरिस होते हुए मुंबई आने वाले भारतीयों ने शिकायत की कि सोमवार को उनके हवाई जहाज के वाशिंगटन से देरी से पैरिस पहुंचने पर उन्हें लाउंज में ही थोड़ा पानी और एक सैंडविच देकर रखा गया। और उन्हें हवाई अड्डे पर ही रुकना पड़ा जबकि अमेरिकी पासपोर्ट वाले लोगों को ट्रांजिट वीजा देकर उन्हें ठहरने का इंजाम कराया गया और उनका खास ख्याल रखा गया। इससे पहले 12 मई को एयर फ्रांस से सफर करने वाले 50 से ज्यादा भारतीयों ने नस्लीय भेदभाव का आरोप लगाया था। पिछले दिनों जर्मनी के पूर्वी प्रांत सेक्सोनी में स्थानीय जर्मन युवकों ने भारतीयों के एक समूह की जमकर पिटाई कर दी। दरअसल कुछ भारतीयों की जर्मन से बहस हो गई और मारपीट की नौबत पैदा हो गयी। इसके तुरंत बाद वहां 50 जर्मन युवक जमा हो गए और उन्होंने भारतीयों को दौड़ा दौड़ा कर पीटा। और नस्लभेदी नारे लगाए। कुछ दिन पहले अफ्रीका में मिस इंडिया अफ्रीका के चुनाव के दौरान भी नस्लभेद कि बात सामने आयी थी। ब्रिटेन के एक रियलिटी शो बिग ब्रदर में भारतीय अभिनेत्री शिल्पा सेट्टी के साथ भी नस्लभेद का मामला सामने आय़ा था। मलेशिया में भी भारतीयों के साथ कई बार नस्लभेदी व्यवहार का मामला सामने आ चुका है। इसी साल 22 जनवरी को न्यूयॉर्क में तीन लोगों ने जसमीर सिंह नाम के एक सिख युवक पर हमला किया जिससे उसकी एक आंख में गंभीर चोट आई थी। 6 जून 2008 में भी न्यूयॉर्क के एक स्कूल में सिख छात्र को पीटने और जबर्दस्ती उसकी पगड़ी निकाल देने का एक मामला सामने आया था। इसी साल 18 मार्च को लंदन में गुरुद्वारा सिख संगत में आग लगा दी गई। आगजनी से एक हफ्ते पहले गुरुद्वारे की बाहरी दीवारों पर नस्ली नारे भी लिखे मिले थे। ऐसे कई मामले हैं जो पश्चिमि देशों की नस्लवादी मानसिकता को जहिर करते हैं।

जातिवाद का ज़हर

पिछले दिनों पंजाब जिस आग में जला उसकी चिंगारी विएना में नहीं भड़की बल्की ज्वालामुखी का ये लावा सदियों पुराना है। जातिवाद की आग तो बस गाहेबगाहे भड़कती रहती है। ...क़ैसर रज़ा

नफरत की ये चिंगारी यूं ही नहीं भड़की, बल्कि इस आग के पीछे जातिवाद का जहर घुला हुआ है। विएना में सिख गुरु की मौत की वजह से पूरा पंजाब धधक रहा है। हिंसा का लावा तब फूटा जब सिख समुदाय के एक वर्ग के लोगों ने विएना में डेरा सच खंड के अनुयायियों पर हमला बोल दिया। इस हमले में एक दलित सिख धर्मगुरु संत राम नंद की मौत हो गई। दरअसल डेरा सच्च खंड दलित सिखों का संगठन है। अमूमन ये माना जाता है कि सिखों में जतिवाद जैसी कोई बात नहीं है। लेकिन हकीकत ये है कि जतिवाद की खाई सिख समुदाय में काफी पुरानी है। डेरा सच खंड की स्थापना गुरु रविदास ने की थी। गुरु रविदास चौदवीं शताबदी के दलित जाति के गुरु थे। जिन्हें सवर्ण सिख गुरु नहीं मानते। कुछ जानकार डेरा सच खंड को सिख धर्म से अलग मानते हैं और इसे रविदास धर्म कहते हैं। लेकिन कई चीजे हैं जिनकी वजह से डेरा सचखंड को सिख समुदाय से अलग नहीं माना जा सकता है। डेरा सच खंड के लोग भी गुरु ग्रंथ साहिब में यकीन करते हैं। इस समुदाय के लोगों की दलील है कि रविदास वाणी यानी गुरु रविदास के श्लोक श्री गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल है लिहाजा इसकी चर्चा होनी चाहिए। सवर्ण और दलित सिखों के इसी गतिरोध का नतीजा है कि पूरा पंजाब नफरत की आग में जल रहा है। और इस संघर्ष की वजह से लाखों लोग प्रभावित हो रहे हैं। पंजाब में जनजीवन अस्त व्यस्त हो गया है। कई रेल गाड़िया रद्द कर दी गई हैं। पिछले दिनों राजस्थान समेत कई प्रदेश जातिवाद की आग में जले थे। जब गुर्जर औऱ मीणा समुदाय के बीच टकराव पैदा हुआ था। जातिवाद की ये आग किसी एक धर्म में नहीं बल्कि सभी धर्मों में मौजूद है। एकता की बात करने वाले ईसाई धर्म में भी दलित और गैर दलित की भावना कायम है। कई चर्चों में तो दलित ईसाईयों से गैर बराबरी का आलम ये है कि उनके बैठने के लिए अलग जगह, पीने के लिए अलग पानी का गिलास और दफन करने के लिए कब्रिस्तान भी अलग है। ऐसे में ब्राह्मणवादी व्यवस्था के कथित जुल्म का शिकार दलित धर्मपरिवर्तन करके भी दलित बने हैं। गोवा में जो ब्राह्मण ईसाई बने वो बामोन्न हो गए, छत्रिय चाटिम और वैश्य गोड्डोस के नाम से जाने जाते हैं। लेकि शूद्र से धर्म परिवर्तन करके ईसाई बने लोग शूरिद्रस ईसाई कहलाते हैं। केरल में भी हालात ऐसे ही है। इस्लाम धर्म में भी एकता की बात होती है। इस्लाम की बुनियद भी बराबरी के बिना पर कायम हुई। इसी लिए कहा गया है कि एक ही सफ में सब खड़े हो गए महमूदो आयाज, ना कोई बंदा रहा ना कोई बंदा नवाज लेकिन हकीकत ये है दूसरे धर्मों की तरह देश में मुस्लिम समाज भी जात बिरादरी में बंटा हुआ है। ऐसे में जातपात की ये दिवार अबतक खत्म नहीं हुई और गाहे बगाहे नफरत का मंजर हमारे सामने आ जाता है।