Tuesday, March 24, 2009

गांधी परिवार की बीजेपी !

मित्रों एक लंबे वक्त के बाद एक बार फिर ब्लॉग पर हाजिर हुआ हूं। वक्त की कमी कह लें या फिर जिन्दगी की आपाधापी में फुरसत के कम होते पल। खैर एक बार फिर आपसे रुबरु होने का मौका मिला है। आपकी हौसला अफजाई का मुंतजिर( प्रतिक्षारत) हूं।....

भले ही विवादास्पद भाषण से ही सही, लेकिन वरुण गांधी की लोकप्रियता का पारा अचानक चढ़ गया है। कईचुनाव क्षेत्रों में बीजेपी के उम्मीदवार वरुण को अपने क्षेत्र में चुनाव प्रचार की दावत तक देंने लगे हैं। वरुण कीलोकप्रियता के इस ग्राफ को देखकर ये सवाल खड़ा होता है कि क्या आने वाले वक्त में बीजेपी गांधी परिवार काहिस्सा होगी या फिर गांधी परिवार महज बीजेपी का हिस्सा बन कर रह जाएगा। आजादी के बाद से कांग्रेसनेहरु-गांधी परिवार के इर्दगिर्द घुमती रही है। अबतक के लंबे सियासी सफर पर नजर डालने के बाद, कांग्रेस कामतलब नेहरु-गांधी परिवार कहें तो गलत नहीं होगा। राजीव गांधी की हत्या के बाद, कुछ सालों तक कांग्रेस मेंगांधी परिवार की पकड़ तकरीबन खत्म सी हो गई। लेकिन सोनिया गांधी के राजनीति में आने के बाद कांग्रेस फिरअपनी पुरानी परंपरा की पटरी पर लौट आई। बीजेपी ने कांग्रेस में गांधी परिवार की इस पकड़ और ताकत का काटउस परिवार की बागी बहू मेनिका गांधी के तौर पर ढूढ़ा। इस तरह गांधी परिवार बीजेपी का हिस्सा बना। बीजेपी नेना सिर्फ मेनिका को टिकट दिया बल्कि, जब केन्द्र में उसकी सरकार बनी तो उसने मेनिका को मंत्री भी बनाया।लेकिन मेनिका का सियासी कद जानवर प्रेम तक ही सीमित रह गया। बेजीपी को उसका कोई खास फायदा नहींहुआ। जब मेनिका गांधी के बेटे वरुण गांधी ने अपने राजनीतिक सफर की शुरूआत की तब बीजेपी को उनकीकाबिलियत पर इतना भरोसा नहीं हुआ। वरुण मध्यप्रदेश के विदिशा से उपचुनाव लड़ने के खाहिशमंद थे, लेकिनशिवराज सिंह चौहान ने वरुण की ये हसरत पूरी नहीं होने दी। इस बार फिर वरुण जब चुनावी समर में उतरने कोबेताब नजर आये तो बीजेपी ने उन्हें उनकी मां की परंपरागत सीट पीलीभीत से टिकट दिया ताकि राजनीति मेंनैसिखिए वरुण आसानी से जीत सकें। लेकिन जब वरुण अपने चुनाव क्षेत्र में मतदाताओं के बीच पहुंचे तो उनकेतेवर पर खुद बीजेपी को एतबार नहीं हुआ। वरुण के तेवर ने संघ में भी नया उत्साह भर दिया। उसे लगा किबीजेपी की उसर होती हिन्दुत्ववादी धरती से एक नयी पौध तैयार हो रही है। जो बीजेपी के परंपरागत एजेंडे को आगे बढ़ा सकती है। वरुण के आक्रमक तेवर को देखकर लगने लगा है कि वो अगली पीढ़ी की नुमाइंदगी कर सकते हैं और तीसरी पंक्ति के नेता की भूमिका निभा सकते हैं। दरअसल बीजेपी में भी परिवारवाद की परंपरा शुरू हो गई है। कई नेताओं के लाडले बीजेपी का हिस्सा बन चुके हैं इनमें कई इस बार चुनावी में दाव भी आजमा रहे हैं। ऐसे में बीजेपी में मुखर नेताओं की कमी और परिवारवाद का बढ़ते सिलसिले को देखकर लगता है कि आने वाले वक्त में बीजेपी की कमान वरुण गांधी के हाथों में आ सकती है। ऐसे में ये सवाल उठना लाजमी है कि क्या बीजेपी आनेवाले वक्त में कांग्रेस की तरह गांधी परिवार का हिस्सा होगी। या फिर वक्त की चोट से वरुण गांधी की धार कुंद हो जाएगी और गांधी परिवार महज बीजेपी का हिस्सा बन कर रह जाएगा।

1 comment:

Anonymous said...

बहुत ख़ुशी हुई..आपको दुबारा ब्लॉग की दुनिया में देखकर.....उम्मीद है की अब आप अपने विचार ब्लॉग पर अपने विचार लिखते रहेंगे.....ढेर सारी शुभकामनाये.......