रामसेतु मसले पर राजनीतिक रोटियां सेकने की कवायद जोरों पर है। सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामें में राम और रामायण के अस्तित्व पर ही सवाल खड़े किये गये। लोगों को विरोध को देखते हुए सरकार ने दूबारा हलफनामा दायर अपनी गलती मानते हुए हलफनामें के विवादित हिस्से को वापस ले लिया। उधर बीजेपी को अगले चुनाव के मद्देनज़र एक नया एजंडा मिल गया है। लेकिन इन सब से परे आदमी अपनी ज़िन्दगी को आस्था और विज्ञान की पटरी पर दौड़ाता सफर तय करता है। इसी पर नज़र डाल रहे हैं शेखर आनंद जी
विज्ञान और आस्था के बीच कोई सेतु नहीं है। दोनों नदी के दो किनारे हैं। जो आपस में कभी नहीं मिलते। इतना ज़रुर है कि दोनों किनारों के बीच ज़िन्दगी पानी की तरह बहती है। वो कभी आस्था से किनारा करती है कभी विज्ञान से। लेकिन ज़िन्दगी आगे बढ़ती है बिल्कुल नदी की धारा की तरह। नदी के एक किनारे पर विज्ञान सोचता है कि धारती पर पानी कहां से आया। विज्ञान पानी की एक बूंद लेकर उसके अस्तित्व तालाशता है। प्राकृतिक रहस्यों को जानने समझने के लिए, वो ऊंचे पहाड़ों पर चढ़ जाता है, गहरे समुद्र में उतर जाता है। विज्ञान लगातार जीवन की उत्पति के रहस्यों को जानने के लिए नये-नये तर्क को काटता हुआ उसके सफर को और लंबा करता है। ब्रम्हाण्ड के रहस्यों को खोजता विज्ञान इतने रहस्यमयी तरीक़ों से आगे बढ़ता है कि अपनी असल खोज से अलग, वो कई रहस्यों का रहस्य जान चुका है। उसी नदी के दूसरे किनारे पर आस्था किसी तीसरी ताकत पर भरोसा करती है। ये भरोसा उसे ऊंचे पहाड़ों से गहरे समुद्र तक एक परंपरा में बांध देता है। ये परंपरायें सदियों तक आने वाले कल की धरोहर होती हैं। आस्था और विज्ञान के दो किनारों के बीच, बहती नदी कई बार चट्टानों से टकराती है। नदी बनने से पहले वो झरने सी गिरती है। लेकिन गिर कर भी उसका अस्तित्व नष्ट नहीं होता। वो पहले से ज्यादा ताकत और उपयोगी होकर आगे बढ़ती है। और उसके हर बहाव के साथ बनते है विज्ञान और आस्था के नये-नये किनारे। नदी किसी एक के फायदे के लिए नहीं... सबके लिए आगे बढ़ती है। लेकिन अपना फायदा तालाशती इंसानी फितरत हर बार नदी पर एक सेतु बनाती है। आस्था के किनारे खड़े होकर इंसान रामायण को पढ़ता है, उसे राम भी दिखते हैं, सीता का हरण भी
दिखायी देता है और रामसेतु भी। आस्था के किनारे पर खड़ा वही इंसान जब विज्ञान के किनार पर पहुंचता है तो उसकी दिलचस्पी धरती के बनते बिगड़ते स्वरुप और उसके रहस्य को जानने समझने में हो जाती है। उसे ना राम दिखते हैं, ना रामायण और ना कोई रामसेतु। विज्ञान के किनारे से उसे पत्थरों की एक लम्बी रेखा दिखायी देती है। जिसे वो एडम ब्रिज कहता है। अपनी बात को साबित करने के लिए वो किसी रामायण को नहीं अपने तर्कों को पैदा करता है। उन्हीं के सहारे वो तीसरी ताकत के अस्तित्व को नकार देता है। यहीं से इंसान के अहं का टकराव शुरु होता है। वो प्रकृति को जीतने के लिए कभी नदी पर बांध बना देता है। कभी अपनी बनायी मशीनों से किसी एडम ब्रिज को तोड़ नया रास्ता बनाने लगता है। दूसरी तरफ आस्था के सागर में गोते लगाता इंसान अचानक जमीन पर आकर पत्थरों से अपनी ही बनायी चीज़ों को तोड़ना शुरु कर देता है। और इन दोनों के बीच लगी आग में आम आदमी से अलग तीसरी दुनिया में रहने वाले नेता अपनी रोटियां सेकने लगते हैं।
दिखायी देता है और रामसेतु भी। आस्था के किनारे पर खड़ा वही इंसान जब विज्ञान के किनार पर पहुंचता है तो उसकी दिलचस्पी धरती के बनते बिगड़ते स्वरुप और उसके रहस्य को जानने समझने में हो जाती है। उसे ना राम दिखते हैं, ना रामायण और ना कोई रामसेतु। विज्ञान के किनारे से उसे पत्थरों की एक लम्बी रेखा दिखायी देती है। जिसे वो एडम ब्रिज कहता है। अपनी बात को साबित करने के लिए वो किसी रामायण को नहीं अपने तर्कों को पैदा करता है। उन्हीं के सहारे वो तीसरी ताकत के अस्तित्व को नकार देता है। यहीं से इंसान के अहं का टकराव शुरु होता है। वो प्रकृति को जीतने के लिए कभी नदी पर बांध बना देता है। कभी अपनी बनायी मशीनों से किसी एडम ब्रिज को तोड़ नया रास्ता बनाने लगता है। दूसरी तरफ आस्था के सागर में गोते लगाता इंसान अचानक जमीन पर आकर पत्थरों से अपनी ही बनायी चीज़ों को तोड़ना शुरु कर देता है। और इन दोनों के बीच लगी आग में आम आदमी से अलग तीसरी दुनिया में रहने वाले नेता अपनी रोटियां सेकने लगते हैं।