बुधवार को जश्ने शबेबरात का माहौल उस वक्त भड़क उठा जब एक ट्रक ने चार लोगों को कुचल दिया। फिर क्या था देखते ही देखते शहर की फिजा बिगड़ गयी। चार लोगों के मौत से गुस्साए लोगों ने जमकर तोड़फोड़ की। लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या आगजनी और तोड़फोड़ से पीड़ित परिवार को संतावना मिल जाएगी। हंगामा बरपाने वाले लोगों ने जो एक जुटता सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने के लिए दिखाई वो पीड़ित परिवार के मदद के लिए क्यों नहीं। अपने को हमदर्द बता कर हंगामा बरपाने वाले लोगों में से कोई उस पीड़ित परिवार का सहारा बनेगा जिसने हादसे में अपना लाल खो दिया। इस तरह के हादसे बताते हैं कि अब मौत के बाद सन्नाटा नहीं पसरता। इन्हीं सब पहलओं पर नज़र डाल रहे हैं शेखर आनंद त्रिवेदी
मुहब्बत के मिसाल को कलेजे से लगाये बैठा शहर जल उठा। जो नज़ारा टेलीवीज़न पर हमने आपने देखा तो कलेजा कांप गया। वो शबेबरात का रुहानी नशा था। जब आगरा का आम शख्स अपने पुरखों को उनकी मज़ार पर रोशनी कर ढ़ूढ रहा था। तभी चार लोग हादसे का शिकार हो गए। रफ़्तार से आते ट्रक ने चार लोगों को मौत की नींद सुला दिया। फिर क्या था हंगामा बरपा। फिर आग लगी। पत्थर बरसे। इंसान अचानक शैतान बन गया। सूरज की रोशनी को दंगे, धुंयें और गुबार ने ढक लिया। दिन चढ़ते-चढ़ते बवाल और बढ़ा। पुलिस कुछ और बेबस हुई। लाठी-डंडों से बात नहीं बनी तो हवा में गोलियां चला दी। बवाल आग की तरह फैला। एक इलाक़े से दूसरे इलाक़े को अपनी चपेट में लिया। नतीजा आगरा शहर के छह थानाक्षेत्रों में कर्फ्यू लगाना पड़ा। लेकिन अब तक कई बड़े सवाल पनप चुके थे। क्या हादसे बताकर होते हैं। यकीन से कहा जा सकता है नहीं। लेकिन हादसों के बाद जो मंजर बना क्या उसे भी हादसा माना जा सकता है। ये सवाल उस भरोसे को हिलाता है जिस भरोसे के साथ शबेरात के मौके पर लोग बेखौफ अपने पुरखों की मज़ार पर थे। जो लोग रुहानियत का अहसास लिये थे, वो अचानक हैवानियत का मंज़र कैसे खड़ा कर सकते हैं। अब इस बात पर बहस हो चली है कि जाने अंजाने हमारे आपके बीच कुछ ऐसे लोग जगह बना चुके हैं जो दरअसल हमारे आप जैसे हैं नहीं। उनकी फितरत का अंदाज़ा लगाना मुश्किल हो रहा है वो बस ऐसे ही किसी हादसे का इंतज़ार करते हैं। जब नफरत और बदले की आग को भड़काया जा सके। आगरा की घटना से कुछ दिन पहले कुछ कांवड़ियों की हादसों में मौत के बाद अलग-अलग जगहों पर कुछ ऐसा ही नज़ारा बना। तब भी सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया। नुकसान पहुंचाने वाले असली तत्व आज भी पुलिस की पकड़ से बाहर हैं। मक्का मस्ज़िद बम धमाके के बाद भी तनाव पनपने से ज़्यादा भड़काया, हुसकाया और उकसाया हुया नज़र आया। नंदीग्राम, सिंगूर मामले में भी राज्य सरकार बाहरी तत्वों का हवाला देती नज़र आई। कुछ ये ही नज़ारा गोहाना कांड में भी देखने को मिल रहा है। एक के बाद एक होते ये हादसे बता रहे हैं कि जिस काम को आतंकी धमाकों से पूरा नहीं कर पाए उसे कुछ ऐसे लोग योजनाबद्ध तरीक़े से अंजाम दे रहे हैं। कि बड़ी-बड़ी एजंसियां भी सुराग नहीं लगा पा रही हैं।