Wednesday, July 11, 2007

आईए उनकी याद में एक शमां जलाएं...

शेखर आनंद त्रिवेदी जी एक बार फिर 'मेरा वतन' के पाठकों से रुबरु हुए हैं। इन्होंने पिछले साथ मुंबई में हुए उस ख़ौफ़नाक हादसे की पहली बरसी पर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की है। उस हादसे में कई मासूम बेवक़्त मौत के मुंह में समा गये। आईए शेखर जी के साथ हम सब भी उन सबों की याद में यादों की एक शमां जलाएं।
कुछ देर के लिए आपनी आंखों को बंद कीजिए। महसूस कीजिए कि आप मुंबई में हैं। महसूस कीजिए भागते दौड़ते इस शहर की रफ़्तार को। महसूस कीजिये एक भरेपूरे शहर में बेहिसाब भीड़ के बीच अपने अकेलेपन को। लेकिन ग्यारह जुलाई दो हज़ार छह को हुए सिलसिलेवार सात धमाकों ने इस बेपरवाह शहर की रफ्तार को रोक दिया। ठीक एक साल पहले। आज ही के दिन। जी हां ग्यारह जुलाई साल दो हज़ार छह। एक के बाद एक सात धमाके। निशाने पर मुंबई लोकल। मुंबई की लाइफ़ लाइन। लेकिन ज़िन्दगी इसी लोकल पटरी पर खून से लथपथ हो गयी। इस शहर ने महसूस किया मौत का सन्नाटा। एक-दो नहीं दो सौ नौ जानों की ख़ामोशी। जिन्हें कतई एहसास भी नहीं था कि मौत कैसे और कब दबे पांव इनकी बोगी में दाख़िल हुयी। जिस रेल से ये लोग अपनी ज़िन्दगी के सफ़र को रोज़ाना आगे ले जाते थे। वही एक झटके में ज़िन्दगी इनके जिस्म से निकाल ले गयी। जो मारे गए उनके परिवार जीते जी मर गये। लेकिन शहर की रफ़्तार को देखिये। बड़ा सवाल दहशत के वो धमाके नहीं, ज़िन्दगी को वापस पटरी पर लाने का था। क्योंकि यही इस शहर की हक़ीक़त भी है और फ़साना भी। रेल विभाग उड़ी हुई बोगियों को हटाने में लगा। अपनी पटरियों को दुरुस्त करने में लगा। पुलिस, प्रशासन आतंकी घटना के बाद के हालात को संभालते दिखा।
नेताओं ने संयम बरतने की सलाह देना शुरू कर दिया। खुफ़िया तंत्र सांप निकलने के बाद लकीर को पीटता दिखा। धमाकों के कुछ घंटों के बाद ही शहर अपनी रफ़्तार को पकड़ चुका था। अगली सुबह तो बिल्कुल आम सुबह की तरह रही।
अख़बार के पन्ने घटना का ब्योरा दे रहे थे। लोग अपने काम के लिए बिलकुल वैसे ही निकले जैसे कुछ हुआ ही न हो। सरकार अपने रोजमर्रा के काम निपटाने लगी। पुलिस-प्रशासन और खुफ़िया तंत्र पन्नों पर उकेरी हुयी तस्वीरों के सहारे बैठ गया। कोई बड़ी गिरफ़्तारी, कोई ठोस सरकारी पहल, आम मुंबई वालों के चेहरे पर कोई शिकन किसी तरह का कोई अफ़सोस, अफ़सोस कि नहीं दिखा। ये कैसी संवेदनहीनता है जो किसी हादसे के बाद ना तो दिलों में खौफ़ पैदा करती है, ना ही इतना वक़्त देती है कि जो गुज़र गये उन पर दो आंसू भी खर्च किये जाएं।