Saturday, July 21, 2007

राष्ट्रपति पद की गरिमा और इस बार का चुनाव

अपनी पाती...
देश की पहली महिला राष्ट्रपती के तौर पर शपथ लेगीं। कांटे का माना जा रहा राष्ट्रपति चुनाव कमोबेश एकतरफा ही रहा। यानी अंतर्रत्माएं प्रतिभा पाटील के लिए बोलीं। भारतीय इतिहास में ये पहला मौका है जब किसी महिला को देश का पहला नागरिक बनने का मौका मिला है। ये न सिर्फ हिन्दुस्तान के करोड़ो महिलाओं के लिए गर्व की बात है बल्कि तमाम देश वालों के लिए खुशी का लम्हा भी। देश के सबसे बड़े संवैधानिक पद पर प्रतिभा पाटील काबिज हो चुकी हैं। लेकिन इस बार के राष्ट्रपति चुनाव के दौरान जिस तर से आरोप-प्रत्यारोप का दौर चला वो पिछले चुनाव में देखने को नहीं मिला। इस गौरवमई पद के लिए जिस तरह से एक दूसरे पर किचड़ उछालने का दौर चला वो काफी दुखद रहा। देश के राजनेता राष्ट्रपति पद की गरिमा को धूल-धूसरित करने में जुटे रहे। आजाद भारत के छह दशक लंबे इतिहास में यह पहला मौका है, जब राष्ट्रपति नाम की संस्था पर सरेआम छींटाकशी की गयी। राष्ट्रपति पद के लिए जब से प्रतिभा पाटील का नाम यूपीए की तरफ से सामने आया तो कई सवाल खड़े हुए। किसी ने कहा-ये वफादारी का सिला है। तो किसी ने वामपंथियों को चित्त करने की चाल बताया। प्रतिभा पर तरह-तरह के आरोप भी लगे। एक सहकारी बैंक के खातेदारों के पैसे गबन करने का मामला उछला। तो चीनी मिल की खातिर बैंक से लिए करोड़ो रुपए के कर्ज को न लौटाने का आरोप भी लगा। इतना ही नहीं पाटील पर हत्या के आरोपी अपने भाई को बचाने का आरोप भी लगा। विपक्ष ने उन पर वेबसाइट भी लॉच किया। ऐसा नहीं कि आरोपों का दौर एक तरफा रहा। भैरो सिंह शेखावत पर भी जमकर कीचड़ उछाला गया। एनडीए पर पलटवार करते हुए यूपीए न शेखावत की नज़दीकियां संघ से बतायी। साथ ही उन्हें एक बागी सिपाही भी कहा गया। घोटालों के आरोप शेखावत पर भी लगे। दोनों तरफ से प्रतिभा और शेखावत के राजनीतिक और निजी ज़िन्दगी के सफर के अनछुए और विवादित पहलुओं को ढ़ूढ कर किताब की शक्ल दी गई और उसे सरेआम किया गया। बहरहाल देश के तेरहवें राष्ट्रपति का चुनाव अगर देश की पहली महिला राष्ट्रपति के लिए याद किया जाएगा तो इस चुनाव में की गयी छींटाकशी भी कभी ना भरने वाले जख़्म की तरह बनी रहेगी। हां ये उम्मीद जरुर की जा सकती है कि आगे के चुनावों में ये जख़्म फिर हरे ना किए जाएं।

Wednesday, July 11, 2007

आईए उनकी याद में एक शमां जलाएं...

शेखर आनंद त्रिवेदी जी एक बार फिर 'मेरा वतन' के पाठकों से रुबरु हुए हैं। इन्होंने पिछले साथ मुंबई में हुए उस ख़ौफ़नाक हादसे की पहली बरसी पर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की है। उस हादसे में कई मासूम बेवक़्त मौत के मुंह में समा गये। आईए शेखर जी के साथ हम सब भी उन सबों की याद में यादों की एक शमां जलाएं।
कुछ देर के लिए आपनी आंखों को बंद कीजिए। महसूस कीजिए कि आप मुंबई में हैं। महसूस कीजिए भागते दौड़ते इस शहर की रफ़्तार को। महसूस कीजिये एक भरेपूरे शहर में बेहिसाब भीड़ के बीच अपने अकेलेपन को। लेकिन ग्यारह जुलाई दो हज़ार छह को हुए सिलसिलेवार सात धमाकों ने इस बेपरवाह शहर की रफ्तार को रोक दिया। ठीक एक साल पहले। आज ही के दिन। जी हां ग्यारह जुलाई साल दो हज़ार छह। एक के बाद एक सात धमाके। निशाने पर मुंबई लोकल। मुंबई की लाइफ़ लाइन। लेकिन ज़िन्दगी इसी लोकल पटरी पर खून से लथपथ हो गयी। इस शहर ने महसूस किया मौत का सन्नाटा। एक-दो नहीं दो सौ नौ जानों की ख़ामोशी। जिन्हें कतई एहसास भी नहीं था कि मौत कैसे और कब दबे पांव इनकी बोगी में दाख़िल हुयी। जिस रेल से ये लोग अपनी ज़िन्दगी के सफ़र को रोज़ाना आगे ले जाते थे। वही एक झटके में ज़िन्दगी इनके जिस्म से निकाल ले गयी। जो मारे गए उनके परिवार जीते जी मर गये। लेकिन शहर की रफ़्तार को देखिये। बड़ा सवाल दहशत के वो धमाके नहीं, ज़िन्दगी को वापस पटरी पर लाने का था। क्योंकि यही इस शहर की हक़ीक़त भी है और फ़साना भी। रेल विभाग उड़ी हुई बोगियों को हटाने में लगा। अपनी पटरियों को दुरुस्त करने में लगा। पुलिस, प्रशासन आतंकी घटना के बाद के हालात को संभालते दिखा।
नेताओं ने संयम बरतने की सलाह देना शुरू कर दिया। खुफ़िया तंत्र सांप निकलने के बाद लकीर को पीटता दिखा। धमाकों के कुछ घंटों के बाद ही शहर अपनी रफ़्तार को पकड़ चुका था। अगली सुबह तो बिल्कुल आम सुबह की तरह रही।
अख़बार के पन्ने घटना का ब्योरा दे रहे थे। लोग अपने काम के लिए बिलकुल वैसे ही निकले जैसे कुछ हुआ ही न हो। सरकार अपने रोजमर्रा के काम निपटाने लगी। पुलिस-प्रशासन और खुफ़िया तंत्र पन्नों पर उकेरी हुयी तस्वीरों के सहारे बैठ गया। कोई बड़ी गिरफ़्तारी, कोई ठोस सरकारी पहल, आम मुंबई वालों के चेहरे पर कोई शिकन किसी तरह का कोई अफ़सोस, अफ़सोस कि नहीं दिखा। ये कैसी संवेदनहीनता है जो किसी हादसे के बाद ना तो दिलों में खौफ़ पैदा करती है, ना ही इतना वक़्त देती है कि जो गुज़र गये उन पर दो आंसू भी खर्च किये जाएं।

Tuesday, July 10, 2007

दिब्याशु जी ने पहली बार 'मेरा वतन' में दस्तक दी है। मीडिया को काफी करीब से जांचा और परखा है। फिलहाल एक राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल से जुड़े हैं। इनके बारे में ज्यादा कुछ बताने की जरुरत नहीं। इन्होंने अपनी पाती में अपना अपने बारे में पूरा लिखा है। मानों इनकी करियर की जद्दोजेहद एक खुली किताब है। जो चाहे पढ़ सकता है। बिना किसी संपादन के उनके लेख को प्रकाशित कर रहा हूं।
आज ऑफ होने की वजह से सोचा कि कुछ लिखा जाए, एक जन्म सिद्ध कर्म जो पिछले कुछ महीनों से भौतिक आलस्य के कारण संभव नहीं हो पा रहा है । तो पहले अपना परिचय ही खासकर मेरा वतन के पाठकों के लिए । नाम है दिब्यांशु , शहर है देवधर। अपने को देवधर का जरुर बताता हूं , वजह साफ है कि जिस पेशे में मैं हूँ यानि खबरिया चैनलों की नौकरी कर रहा हूं इसमें कई बडे चैनलों के शीर्षस्थ पदों पर देवधर के सपूत विद्यमान हैं । हालांकि ज्यादातर के बारे में यही विख्यात है उन्हें अपने अलावा और किसी की चिंता नहीं रहती । फिर भी इनके साथ अपने को जोड़ने का एक प्रयास जरुर करता हूं । नाम बताने में संकोच और डर दोनों है, क्यों, इसकी वजह लोग खुद समझे। साल 1997 में दिल्ली आया था आईएएस बनने के लिए, विषय था इतिहास और हिंदी साहित्य, सीनियर्स ने बताया कि आईएएस बनना है तो उसी की तरह अभी से सोचो तुम्हारी कंडीशनींग होनी चाहिए वैसी । पूरे 5 साल अपने को जिलाधिकारी समझता रहा ...... अभी तक यह दुर्गुण कभी-कभी अपनी झलक दिखला जाता है, जिसकी परिणति मित्रों के पास नौकरी की याचना के रूप में ही होती है । खैर इन 5 साल में 2 बार धौलपुर हाउस में इन्टरव्यू दे आया । कुछ दिनों तक मित्रों को गर्व से बताता रहा कि कट ऑफ से 7 नंबर कम रहा तो कभी 13 नम्बर कम रहा । इसी बीच घर से ख़बर भी आती रही कि आज बरतुहार आये थे लड़की इकोनोमिक्स में एम.ए. कर रही है तो बी.एस सी मैथ्स है ... लगा शादी कर लेंगे तो खिलाएंगे क्या? मित्रों ने कहा अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है कहीं से एमबीए वगैरह कर लो अभी तो 25 वर्ष ही हुआ है। 10-15000 की नौकरी मिल जाएगी, हिम्मत करके घर गया, बाबूजी से कहा तो कहने लगे पांच साल दिल्ली में रहे पूरे 6 लाख रुपये खर्च हुए ... मिला क्या? पैसा तुमने बर्बाद किया तुमने पढ़ाई की ही नहीं अब फिर 3 साल एमबीए करोगे फिर 4-5 लाख लगेगा सोच लो। साक्षात्कार के लिए 2-2 बार बुलावा आया, बुलावा पत्र अभी भी ब्रीफकेस में पडा मुंह चिढा रहा था, कागज ख़राब न हो जाए इसलिए लेंमिनेशन करवा लिया था, महंगा वाला सदर बाजार जाकर। बार-बार निराला की कविता याद आती थी। दुख ही जीवन की कथा रही ... । हाँ एक घटना भी इसी वक्त हुई कि पिछले 2 वर्षों से जिस रुपसी के प्रेम जाल में उलझा हुआ था उन्हें मुझमें कई कमियां नज़र आने लगीं। मसलन में उनके फूआ जी के प्रति असम्मानजनक व्यव्हार करता हूं। इसलिए वो मुझसे शादी नहीं करना चाहती है। और उनकी माता जी जो कभी दो दिन तक मेरे फोन न आने से बिचलित हो जाती थी और खुद ही फोन करके पूछने लगती थी। कि “............” को फोन क्यों नहीं कर रहे है। उन्होंने एक दिन ये शुभ सूचना दी कि “.......” की शादी फला जगह ठीक हो गई है। मेरे आगे वो दृश्य घूम गया जब हम दोनों को आलिंगनबद्ध देखकर माता जी नज़रें बचाकर निकल गई थीं। वजह साफ थी लड़का IAS बनने वाला था। लौटते है टीवी की नौकरी पर, करियर को लेकर जो चिंता थी, उसे खत्म किया बड़े भाई तुल्य एक व्यक्ति ने जो झारखंड के एक प्रतिष्ठित अख़बार में वरिष्ठ पद पर कार्यरत थे। एक शादी में हम दोनों शामिल होने गए। तो उन्होनें कहा कि देवघर में हमारे अखबार का संस्करण प्रकाशित हो रहा है। श्रीमान ‘अ’ संपादक बनकर आ रहे है। उनसे मिलकर मेरा नाम कहना, वो तुम्हे नौकरी पर रख लेगा। ‘अ’ जी से मिला, उन्होने नौकरी पर रखा भी। वेतन तय हुआ दो हजार रूपया महीना। याद आया, दिल्ली में पढ़ाई के दौरान चार हज़ार रूपया तो कमरे का किराया देते थे। पहले ही दिन ‘अ’ जी ने कुर्तिदेव का लेआउट पकड़ा दिया और कहा टाईप करना सीखिए। इससे पहले कि मैं हेंड फ्री टाइपिंग कर पाता ‘अ’ जी नौकरी छोड़कर चले गये। मुझे अखबार में जनरल डेस्क का इंचार्ज बनाया गया। पहला और अंतिम पेज मैं ही बनाता था। पत्रकार बनते ही पिताजी से पैसा लेकर मोबाइल खरीदा। पहले महीने में ही ढाई हज़ार का रिचार्ज कूपन डलवाया। महीने की पहली ताऱिख को सैलरी मिली दो हज़ार रुपये। आठ नौ महीने गुजरे तो अपने को तौलने लगा .... अखबार के संपादक तक ज्ञान के कायल थे..... मित्रों ने कहा कि टी.वी. में ट्राई करो..... तुम्हारे अंदर टाइलेंट है । याद आया अरे आजतक के एक्ज़क्यूटिव प्रोड्यूसर फलां जी तो हमारे स्कूल में पढ़ते थे। वो तो जरूर मदद करेंगे नही तो पुराने दोस्तो से कहलवायेंगे। फिर वहां एमके जी भी है दूरदराज की रिश्तेदारी भी है उनसे...... काम हो जाएगा.... इसी बीच श्रीमान अ जी .... जिनसे लगातार मैं फोन पर संपर्क में था .... ने बताया कि उनकी नौकरी सच दिखाने वाले चैनल मे हो गई है। उनके लागातार आश्वासनों, खुद के संबंधो और कुछ भाग्य पर भरोसा करके एक बार फिर दिल्ली वापस आ गया..... नौकरी की तलाश में। दिल्ली आने के दसवें ही दिन एक एनजीओ में नौकरी मिल गई। सूचना के अधिकार पर काम करने वाली ये संस्था डॉक्यूमेंटरी और विजुअल पैकेजिंग का काम करती थी। सेटअप छोटा था लेकिन वेतन अच्छा था। दस हज़ार रुपये महीना...... लेकिन किस्मत में नारी से संताप लिखा था सो प्रेमिका से धोखा खाये छह महीना भी नही बीता था कि एनजीओ की कर्ता-धर्ता एक युवति का कोपभाजन बन गये। दरअसल मोहतरमा कुछ ज्यादा ही नफ़ासत पसंद थी जबकि मैं भदेस अभिजात संस्करण का व्यक्ति था। जैसे तैसे महीना बीता और मैने नौकरी छोड़ दी। उन दिनों एक नया चैनल शुरू हो रहा था जो आज कल फिर नया होने को लेकर चर्चाओं में है। एक महीने में ही जितना हो सका था.... टीवी सीखने की कोशिश की थी । उपकरणों के साथ संबंध मात्र इतना ही था कि एनजीओ की कर्ता धर्ता महोदय शूट पर जाते हुए कैमरा मैन के साथ मुझे ट्राइपोड लेकर भेजते थे । ट्राइपोड इधर से उधर करने में ही मै अपना रुतबा प्रोड्यूसर से कम नही समझता था। भूख पर बन रही एक फिल्म के सिलसिले में जब उन्होनें मुझे एक झुग्गी में भेजा तो साढ़े तीन फीट के दरवाजे के अंदर जो अंधेरा था वो मेरे बॉस के चेहरे पर पसरी लालिमा भरी सफेदी से कुछ कम ही डरावना था। खैर मैने नये आ रहा चैनल में प्रयास शुरू किया और जुगाड़ की बदौलत नौकरी पा भी गया। नया ऑफिस.... बड़ा ऑफिस बिल्कुल साफ सुथरा...... लगा जीवन का मकसद पूरा हो गया ..... पहले ही दिन एचआर ने सबसे मिलवाया .... हैलो हाय हुई, लड़कियों से हाथ मिलाया। अबतक तो पांच छह से ही हाथ मिलाने का मौका मिला था। आज एक ही दिन में पंद्रह बीस से.... आखिर ये प्रोफेशनल दुनिया है। खैर.... य़हां हमारी बॉस थी एक महिला ....नाम मैडम एक्स ...... गोरा रंग .... घुंघराले बाल.... नाटा कद । पता चला मैम बीबीसी में काम करती थी ..... डिस्कवरी के लिए प्रोग्राम बनाया है। यहां ईपी हैं.... पूरे दस आदमी की टीम थी। मैम दिन में तीन बार मीटिंग लेती थी । शुरू शुरू में अच्छा लगा कॉरपोरेट कल्चर यही है। सोचा यहां सीखने का पूरा मौका मिलेगा। फिर छह आठ महीने में जुडाड़ लगाकर किसी अच्छे चैनल में चला जाउंगा। मीटिंग में मैम अपने रौद्र रूप में रहती थी। खालिस अंग्रेजी बोलती थी, चुटकी भी अंग्रेजी में बजाती थी। बाहर निकलकर मै भी वैसी चुटकी बजाने की कोशिश करता। एक दिन मेम ने कहा कि चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया को स्टूडियो पैनल डिस्कशन में बुलाओ । मै हतप्रभ आखिर इतनी समझ भी नही है...... फिर धीरे धीरे साफ हुआ। मेम के पूरे व्यक्तित्व में हवा भरा हुआ था कायदे से इन्हे रिसेपशनिस्ट की नौकरी भी नहीं मिलनी चाहिए। चैनल की दुनिया में इन्हे कोई भी आदमी अपनी टक्कर का नही लगता। अक्सर कहती ‘राज... प’ को कुछ नही आता। ‘एनभी टीवी’ में किसी को विजुअल्स की समझ नही है। बीबीसी मेरे कई डाक्यूमेंटरी की स्टाईल फालो करती हैं। मेम के बालों में जितना घुमाव था उससे ज्यादा पेचीदगी उनके दिमाग में थी। जबतक आफिस में होती चैनल के दूसरे लोगों की निंदा और अपनी टीम को लड़ाने की जुगत में लगी रहती थीं। हां एक काम जरूर करती थी ढ़ाई- तीन मिनट के अपने पैकेज में वॉयस ओवर वो खुद करती थी। उनका मानना था कि वही अपनी आवाज से स्टोरी को फिलिंग दे सकती थी। इस पूरी प्रक्रिया में उनका साथ देने के लिए मौजूद रहते थे मिस्टर ‘वाई’। टीम और चैनल में उनकी उपयोगिता आज तक मेरी समझ में नही आय़ी। मिस्टर ‘वाई’ मेम के साथ ही आते और साथ ही जाते। आउट डोर शूट पर भी दोनो साथ साथ। बिल्कुल बादशाह बेगम की जोड़ी। सूत्रो ने बताया कि ‘वाई जी’ मैम के पुरूष रखैल थे। इन दोनों की जोड़ी उन चंद आत्म मुग्ध लोगों में थी जो हस्तमैथुन से भी संतान पैदा करने की कल्पना करते रहते हैं। एक अन्य महिला जो चैनल में काफी प्रभावशाली थी उनके बारे में भी अक्सर सुनने को मिलता। मेम इनके साथ...... तो उनके साथ । जल्द ही मैडम ‘एक्स’ से मेरा मोहभंग हो गया। उपर से विधाता ने नारी से संताप का विधान कर ही रखा था । मेरे पूरे दिन की मेहनत को मेम मेरे सामने रद्दी की टोकरी में फाड़ कर फेंक देती थी। मीटिंग में मुझे बेइज्जत करती और अपने पालतुओं की शेखी बघारती थीं। फिर कैफेटेरिया में बैठ जाती वहां चाया नाश्ते का दौर चलता। मै दूर से तटस्थ भाव से उन सबको निहारता रहता। वहां भी मेरे बारे में ही चर्चा होती। वाई जी कहते मेमे ये भूमिहार है इसका अगला कदम क्या होगा समझना मुश्किल है। दूसरा कहता अरे नही सर ब्राम्हण है वो भी मैथिल अंग्रेजों ने कहा था कि मैथिल ब्राम्हण और कोबरा सांप दोनों एक साथ मिल जाय तो पहले मैथिल ब्राम्हण को मारो। मेम भी मुझे कुचलने में मुझे दिन रात लगी हुई थी। इधर अपने काम और व्यहार से मैने चैनल में कुछ महत्वपूर्ण लोगों से संबंध बना लिया था। चैनल के न्यूज डायरेक्टर मुझे अपने प्रोग्राम की जिम्मेदारी देना चाहते थे। एक सीनियर प्रोड्यूसर मेरा आडिशन करवा रहे थे। उनका मानना था कि एंकर नौलेजबुल होना चाहिए। इस सबके बीच मुझे अपनी कमजोरियों का एहसास था। मुझे लगता था अभी दो तीन साल सीखने की जरूरत है। दो तीन बार मेम से बात करने की कोशिश की उनसे बातचीत बिल्कुल ही बंद थी। लेकिन उन्होंने तय कर लिया था । एक दिन पता चला मेम ने एमडी से कह दिया है कि वो मुझे चैनल में नहीं रखना चाहती। मुझे बाहर कर देना चाहिए। इस बीच दो महत्वपूर्ण चीजे हुई। मेरे शुभचिंतकों ने एमडी को मेरी संभावनाओं और क्षमताओं का हवाला देकर मुझे बाहर होने से रोक लिया................ मुझे किसी सफाई के लिए भी नहीं बुलाया गया। हुआ बस इतना कि मुझे मेम की टीम से हटाकर एक कार्यक्रम की जिम्मेदारी स्वतंत्र रूप से दे दी गई। ये पनिसमेंट था या प्रोमोशन मैं समझ नहीं पाया। यहां एक बात का उल्लेख जरूर कर दूं कि इन्हीं सब के बीच मेरा साक्षात्कार आजतक चैनल पर हो गया था। और वहां से जो सूचना मिल रही थी उसके हिसाब से पंद्रह से बीस दिन के बीच में वहां जाना तय था। अधिक से अधिक एक महीना। प्रारम्भ से ही दो व्यक्तियों का मार्गदर्शन और स्नेह मुझे मिलता रहा। कैरियर के किसी भी महत्वपूर्ण निर्णय का फैसला इन दोनों के परामर्श के बिना संभव ही नहीं। एक तो श्रीमान् ‘अ’ और दूसरे राकेश सर खासतौर पर राकेश सर का आभार व्यक्त करने के लिए पूरा ज़िदगी कम पड़ेगी। जिन्होने मेरे मिस कॉल का जवाब अपनी व्यस्तताओं के बाद भी मुझे फोन करके दिया। इन दोनों से मेरे संबंधों का सेन्ट्रल मेटाफर मेरी श्रद्घा ही रही है न कि किसी अन्य लाभ की अपेक्षा। लौटते है पूरानी घटना पर..... तो एक तो ये सारी बाते मान ली और हामी भर दी कि उन्हें मुझे समझने में भूल हो गई। मैं जो दिखता हूं वो हूं नहीं। अब ये बाते मैडम एक्स के सौदर्य के प्रभाव में हुई या पराठे वाली गली में बैठकर बतकही करते हुए पता नहीं लेकिन ‘अ’ जी से फोन पर बातचीत बंद हो गई। एक दिन खबर मिली कि महोदय हमारे चैनल के बाहर आय़े थे। ख़बर ऐसी ही थी कि स्वर्ग लोक का कोई मंत्री पटना के सब्जी मंडी में घुमने के लिए आये। ‘अ’ जी जिस चैनल में है उसकी नौकरी स्वर्ग प्राप्ति के समान ही मानी जाती है। मैने उन्हे फोन किया, पुछा जब हमारे आफिस आये थे तो हमें बताया होता, आपके दर्शन तो हो जाते। ‘अ’ जी सरल व्यक्ति ठहरे बोले अरे नहीं उधर से गुजर रहा था ... पुस्तक मेला जाना था तो सोचा ‘रा........नी’ जी से मिलता जाऊं। मामला समझ मे आया। रूपसी से मिलने की आकंक्षा तो इंद्रदेव को भी धरती पर खींच लाती है । ये हमारे चैनल में काम करने वाली एक रुपसी थी जिनके कैरियर को लेकर ‘अ’ जी खासे सक्रिय रहे हैं। अपने स्वर्ग वाले चैनल में उनका कई बार टेस्ट करा चुके हैं। इधर मेम मेनेजमेंट पर लगातार दबाव बना रही थी। आखिर जीत मैम की हुई , चैनल के जी.एम. ने मुझे अपने केबिन में बुलाया , चाय पिलाई कहा हम लोगों को तुमसे कोई शिकायत नहीं है तुम्हारे प्रोग्राम को फिलहाल बंद किया जा रहा है, ऊपर से फैसला हुआ है आज 16 तारीख है तुम छुट्टी ले लो और 31 तारीख के लिए अपना रिजिनेशन लिख दो । हालात बदलेंगे तो हम तुम्हें दुबारा बुलाएंगें , सीनियर प्रोड्यूसर बनाकर । जी एम के कमरे से बाहर निकल रहा था तो मेम ‘एक्स’ टकरा गईं उनके चेहरे पर विजयी मुसकान थी । मैम मुझे पहले कभी इतनी खूबसूरत नहीं लगी थी। उनका सामने का हिस्सा कुछ ज्यादा ही आगे निकल आया था। मैं वापस अपनी सीट पर पर गया। कम्प्यूटर पर लिख रहा था ...ड्यू टू पर्सनल रीज़न ...........। मैम सीट के पीछे खड़ी थी कह रही थी आप अभी तुरंत ये सीट छोड़ दीजिये इसपर शेखर जी बैठेंगे स्क्रिप्ट टाईप करनी है इन्हें । मैने जैसे तैसे पूरा किया .... थेंकिगं यू ... दिब्यांशु। सोचा आहत का अपमान प्रोफेशनल बिहेवियर नहीं बल्कि घोर पतन का लक्षण है। उसी दिन रात को साढ़े दस बजे आजतक से फोन आया...... अभी आपका मामला 2-3 महीनों के लिए टल गया है । रातभर अपने को वीडियोकोन टॉवर के लिफ्ट से अंदर बाहर होता देखता रहा। कभी फोर्थ फ्लोर कभी सेवन्थ फ्लोर । सुबह नींद खुली तो एक मित्र ने फोन कर बताया कि उनके चैनल के न्यूज़ हेड ने बुलाया है। शाम को मिलने गया । दूसरे दिन रविवार था । सोमवार से एक नए आफिस में हूं। ठीक-ठाक चल रहा है । एक शब्द अक्सर हर बात में बोलना सीख गया हूं , अपने सहकर्मियों के संगत से ..... चूतिया । इस शब्द की उत्पत्ति पर जब गौर करता हूं तो सोचता हूं अब नहीं बोलूंगा । दरअसल मेरी स्थिति असाध्य वीणा के उस साधक की तरह है जो अपना सारा अहं उस वीणा को समर्पित कर देता है जिसे आजतक कोई नहीं बजा पाया... अचानक फोन बज उठता है सलाम करने की है आरजू का पोलिफोनिक रिंग टोन फ़िज़ा में गुंजता है..... नंबर देखता हूं तो मुंह से निकल पड़ता है चूतिया और वीणा के तार झनझना उठते हैं। दिब्यांशू