Sunday, May 20, 2007

तु भी तो कभी मां बनेगी …

तपन कुमार नीरज भागलपुर बिहार से ताल्लुक रखते हैं। इन्होंने अपने पहले दिल्ली दौरे के अनुभव को हमारे बीच बांटा है।
बात उन दिनों की जब मैं दिल्ली में नया था। दिलवालों की दिल्ली की परिवेश से मैं पूरी तरह अनभिज्ञ था। पत्रकारिता में कैरियर बनाना था, इसलिए मैं भारतीय जनसंचार संस्थान टेस्ट देने जा रहा था। उस समय मैं पटेल नगर में ठहरा था। मुझे पटेल नगर से जे.एन.यू के न्यू कैम्पस में जाना था। जहां आई.आई.एम.सी स्थित है। मैं डी.टी.सी बस में सवार हो गया। बस में भीड़ ठसाठस थी। बैठने की छोड़िए, पैर रखने के लिए इंच भर जगह नहीं थी। भीड़ इतनी कि खड़े रहना युद्ध जीतने जैसा था। उस पर अप्रैल-मई का महीना अलग। गर्मी से सभी बेहाल। खैर किसी तरह मैं एक पैर पर खड़ा हो गया। करता भी क्या इसके अलावे मेरे पास दूसरा कोई विकल्प नहीं था। बस धीरे-धीरे बढ़ रही थी। बस का हेल्पर और ज्यादा सवारियों को चढ़ना चाहता था, इसलिए बार-बार चिल्ला रहा था। आगे बढ़ो - आगे बढ़ो कह कर सवारियों के साथ धक्का-मुक्की कर रहा था। बस ने अब कुछ रफ़्तार पकड़ लिया था। गर्मी और उमस से मुझे नींद आने लगी। बार-बार जम्हाई आ रही थी। नींद न आये, इसके लिए मैंने साथ लाए समाचार-पत्र पढ़ने की कोशिश करने लगा। लेकिन भीड़ चिल्ल-पों और धक्का-मुक्की से निज़ात तो मिले। तभी कुछ पढ़ा जाय। बहुत कोशिश करने पर समाचार-पत्र के विशेषांक का पन्ना मोड़ कर एक हाथ में रख लिया। जैसे ही थोड़ा हाथ उठाने का मौका मिला, मैंने मिले मौके का झट से इस्तेमाल किया। मैं पढ़ने लगा। लेकिन धक्का-मुक्की से पीछा अभी भी छूट नहीं रहा था। मेरे हाथों में पेपर का जो पेज था, उसमें एक कहानी थी। कहानी का शीर्षक था -- "वो तोड़ती पत्थर " । मुझे हाई स्कूल की याद आ गई। नौवीं-दशवीं में एक कविता पढ़ी थी, उसका शिर्षक भी तोड़ती पत्थर ही था। मैं यादों में खो गया। उस कविता की गहराई में और जाता कि एक आवाज़ से मेरी तंन्द्रा टूट गई। जिस आवाज़ से मेरी तंन्द्रा तोड़ी, वह आवाज़ रह-रह कर आ रही थी। मेरा ध्यान बार-बार उसी आवाज़ की तरफ जा रही थी। मैं थोड़ा आगे खिसक गया। अब आवाज़ पहले की अपेक्षा ज्यादा स्पष्ट आ रही थी। आवाज़ से स्पष्ट था कि कोई महिला दर्द से कराह रही है। मेरा ध्यान अब परीक्षा की तरफ नहीं था। मेरा मन बार-बार यह सवाल कर रहा था कि आखिर यह महिला दर्द से चिल्ला क्यों रही है। मन में तरह-तरह के सवाल-जबाव उत्पन्न हो रहे थे। मैं यह जानने को उत्सुक था कि आखिर वह परेशान क्यों है। बस अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ती जा रही थी। मैंने गौर किया कि बस जब-जब हिचकोले खाती, तब-तब महिला और जोर से चिल्लाती। अब मैं कारण जानने के लिए तरह-तरह के कयास लगाने लगा। लेकिन जैसे ही महिला थोड़ा पीछे मुड़ी, मेरी शंकाएं दूर हो गयी। महिला प्रिगनेंट थी। शायद प्रिगनेंसी लास्ट स्टेज में था। इसलिए वह अत्यधिक पीड़ा में थी। वह कातर नज़र से सभी बैठने वालों को देख रही थी। शायद वह चाह रही थी कि कोई उसे बैठने के लिए जगह दे दे। लेकिन वह सिर्फ देखती रही, किसी से कुछ कहा नहीं। उसकी आँखों में दया की भीख नज़र रही थी। पहने हुए कपड़ों से लग रहा था कि वह बेहद ग़रीब है। कपड़ा भी बहुत गंदा। रंग सांवला। बाल उलझे-उलझे। साड़ी मैले-कुचैले। गर्मी का मौसम होने के शरीर से बदबू रही थी। इस कारण वह जहां खड़ी थी, अगल-बगल के सभी यात्री नाक पर रूमाल लिए। खास कर दिल्ली की लड़कियां। सभी लड़कियां आपस में खुसर-फुसर कर रहीं थीं। महिला दर्द से कराह रही थी। उससे दर्द सहन नहीं हो रहा था। उसके पेट के अंदर जो सुनामी कहर बरपा रहा था, उसे वह सहन नहीं कर पा रही थी। उसे किसी की मदद की जरूरत थी। आखिरकार उसने हिम्मत जुटाया और लड़कियों से बोली --- बहन मेरी दशा पर तरस खाओ। मुझे बैठने दे दो। काफी गिड़गिड़ाई लेकिन दिलवालों की दिल्ली की लड़कियों का दिल नहीं पसीजा। सभी ने बुरा-भला कहा। कुछ ने कहा, न जाने कहां-कहां से चले आते हैं। उस महिला का धीरज टूट गया। उसने कहा, "भगवान न करें कि आप सबों को ऐसा दिन देखना पड़े। आखिर तु भी तो सभी मां बनेगी "। इतना कह कर वह फूट-फूट कर रोने लगी। इतने में एक माडर्न सी लड़की ने कहा कि मैं तुम्हारी तरह धक्के थोड़े ही खाऊंगी। इतना कहने के बाद मुँह फेर लिया। वाह री दुनियां। मैं सोचने पर मजबूर हो गया कि आखिर हमारे समाज को हो क्या गया है। मानव इतना असंवेदनशील क्यों हो गया है। किसी के दर्द को समझने के बजाय हम तमाशबीन क्यों हो जाते है। कभी तो हम यह सोच कर देखें कि उस महिला की जगह हम होते तो क्या होता। सभी तो लक्ज़री कारों का उपयोग नहीं कर सकते। आज भी भारत की तीस करोड़ आबादी गरीबी रेखा से नीचे अपना जीवन-यापन करते हैं। मैं उधेड़बून में था। मन में तरह-तरह के विचार उत्पन्न हो रहे थे। दिल कह रहा था कि ग़रीब होना भी एक अभिशाप ही है। उस महिला की दयनीय दशा देख कर मुझे बड़ा कष्ट हो रहा था। उसकी दशा देखकर मुझे फिर से तोड़ती पत्थर की याद आने लगी। मैं विचार में इस कदर खोया था कि मुझे पता भी नहीं चला कि कब बैर सराय आ गया। अब मेरी मंजिल आ गयी थी। दिलवालों की दिल्ली के रूखेपन देखकर मैं सिहर गया। मुझे समझ में नहीं पा रहा था कि अमीरी-गरीबी में इतनी खाई क्यों। क्या ग़रीबों को जीने का अधिकार नहीं है। जीने का हक़ तो सभी को है, न कि सिर्फ अमीरों को। मैं धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हुए, बुझे मन से भारतीय जनसंचार संस्थान चला गया।

3 comments:

Anonymous said...

Niraj aapka lekh padh aur apne hatho ko ptrikriya dene se rok nahi paya..
aapne jo bhi anubhav kiya usse main rozana rub rub ru hota ho...aur logo ke ish vaivahar se dil ko bahut thes pahuchti hai...Samanyath tho log ish baat ko najarandaj kar dete hai...lekin kuch log aap jaise bhi hote hai jiske andar ka insan aaj bhi zinda hai...

Anonymous said...

yaar neeraj mana ki delhi valon me kuch rookhapan aaya hai lekin itna bhi nahi jitna aap bata rahe ho. aapne accha likhne ke chakkar me kori faltoo ki baat hi likh di jo hazam nahi ho rahi hai. koi itne kast me ho aur use esi halat me bhi help nahi mile esa to kanhi bhi nahi ho skta hai......
aur fir aapne bhi kuch nahi kiya.......keval sochte hi rah gaye...lanat hai aap par. such likhna sikh lo huzoor....
abhi insaniyat itni bhi kam nahi hui hai ki pregnent lady ko koi bhi help na kare....chahe vo delhi ki girls ho ya fir kisi dusre city ki......har koi esi condition me help ke liy aage aa jata hai. to neeraj bhai sochsamjhkar likho. apne aap ko gareeb samjhkar ya bolkar kisi dusre se kam na smjho. esi soch ko jitni jaldi ho sake apne mind se nikal do.........

Anonymous said...

Niraj aapka lekh padh aur apne hatho ko ptrikriya dene se rok nahi paya..
aapne jo bhi anubhav kiya