Sunday, May 27, 2007

छात्र की नागरिक भूमिका

यतेन्द्र शर्मा युवा पत्रकार है। युवा राजनित और करियर पर लिखते रहते हैं। पहली बार इन्होंने मेरा वतन में दस्तक दी है।
पुरानी शिक्षा प्रणाली और नई शिक्षा प्रणाली में आमूलचूल बदलाव आया है। चाहे शिक्षण परिसरों की बात हो या शिक्षण कार्य के तौर-तरीक़ों की। सभी में किसी न किसी तौर पर बदलाव देखने को मिला ही जाता है। पहले विद्यार्थी पढ़ने के लिए गुरुकुल में जाते थे। गुरुकुल व्यवस्था में रहने, खाने, पढ़ने और शारीरिक व्यायाम जैसी सभी सुविधाएं होती थीं। इनका उदाहरण हमारे प्राचीन ग्रंथों व इतिहास की किताबों से मिलता है। पहले विदेशों से छात्र ऊंची पढ़ाई के लिए हमारे देश में आते थे। हमारे यहां के तक्षशिला, नालंदा जैसे कई विश्वविद्यालय गुरुकुल पद्धति के श्रेष्ठ उदाहरण थे। इनमें शिक्षा हासिल करना बहुत बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी। देश की आज़ादी के बाद पिछले 60 वर्षों में शिक्षण व्यवस्था के स्वरुप में तेजी से बदलाव हुआ है। पहले मंडलों में एक या दो कॉलेज होते थे और विद्यार्थी का ज्यादा वक़्त परिसर में बितता था। लेकिन स्वतंत्रता के बाद अब देश-विदेश के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी, सर्वागीण विकास व प्रतिस्पर्धा की भावना जागृत होने की वजह से नए-नए कॉलेजों की स्थापना हुई। जिनमें आकर्षण के चलते उनमें पढ़ने के लिए छात्र समुदाय में व पढ़ाने के लिए अभिभावक समुदाय में ललक पैदा हुई। लेकिन मौजूदा वक़्त में तालीम हासिल करने के लिए स्टूडेंट को कॉलेज परिसर में पहले की तरह चौबीस घंटे न रहकर कुछ वक़्त ही गुजारना पड़ता है। जिसकी एक ख़ास वजह कोचिंग क्लासेज़ और ट्यूशन का भी होना है। लेकिन गरीब तबके के छात्र-छात्राएं तो इससे भी महरुम है। दिनों-दिन मंहगाई में हो रहे इज़ाफे की वजह से छात्र समुदाय को कई तरह की परिशानियों का सामना करना पड़ता है। जिसकी वजह से छात्रों की भूमिका समाज में नागरिक भूमिका के रुप में उत्पन्न हुई। छात्र को कल का नागरिक माना जाता है लेकिन सही मायने में देखा जाए तो छात्र आज का नागरिक है न कि कल का। इसके लिए हमें पिछले घटनाओं के परिपेक्ष में जाना होगा- दुनिया में कई आंदोलन हुए है चाहे वो वियतनाम का आंदोलन हो या फ्रांस का आंदोलन, सभी की शुरुआत छात्रों के ज़रिए उठाई आवाज़ और उनके संघर्ष से हुई है। और इन आंदोलनों की प्राप्ती अपने उद्देश्य की प्राप्ती अर्थात सही नेतृत्व में सत्ता को सौंपने से ही हुई। अगर भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को ही लें तो जितन क्रांतिकारी या महापुरुष हुए उनमें से ज्यादातर अपने छात्र जीवन से ही संघर्ष करना शुरु कर दिया था। अगर हम पुरातन काल में भी जाते हैं तो देखते हैं कि त्रेता युग में भी छात्र जीवन व्यतीत करते हुए राम व लक्ष्मण ने ऋषियों के यज्ञों व आश्रमों की रक्षा कर समाज के नागरिक जीवन के कर्तव्यों का ही परिचय दिया था। इन सभी आंदोलनों, संघर्षों व तथ्यों से यही साबित होता है कि छात्र आज का नागरिक है न कि कल का। और फिर आठारह साल की उम्र के बाद संविधान भी मताधिकार व इक्कीस साल के बाद चुनाव लड़ने का अधिकार हक देता है। आमतौर पर इस उम्र में अधिकांश व्यक्ति छात्र जीवन ही जी रहे होते हैं। और ये अधिकार तो देश के सम्मानित नागरिक होने का भी एहसास कराते हैं।
इसलिए छात्र समुदाय को अपनी भूमिका को सामने लाकर अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह करना भी आज के हालात को देखते हुए जरुरी है। क्योंकि आज विश्व में आतंकवाद का विकृत व विकट रुप सामने आ रहा है। लेकिन क्या हमने कभी ये सोचा है कि ये आतंकवादी कौन हैं? ये कहां से आते हैं? ये कहां रहते हैं? ऐसे कई सवाल हैं । अगर हम इन पर गौर करें तो पाएगें की ज्यादा तर आतंकी आज के भटके हुए छात्र हैं जो हमरे कॉलेज परिषरों, हॉस्टलों में पनाह लेते हैं। कुछ स्वार्थी तत्व इनकों धर्म व जात-पात में भेदभाव की राजनीति करते इनकों गुमराह कर अपना उल्लू सीधा करते हैं। इसलिए छात्र समुदाय को चाहिए कि ऐसे व्यक्तियों पर नज़र रखकर उन्हें खुद से दूर रखें। इस नाते छात्र एकता को जगाना होगा। हमारा दायित्व बनता है कि इस आतंकवाद का कब्रिस्तान भारत में बनाया जाए। इस लिए छात्रों को समाज में पनप रहीं अनेक कुप्रथाओं के ख़िलाफ़ जागरुकता का परिचय देना होगा। क्योंकि ज्यादातर अपराध बिना तरुण(नौजवान) की सहमति के हो ही नहीं सकते हैं। जिनमें ख़ास तौर पर दहेज़ हत्या जैसी बुराईयां शामिल हैं। इसलिए छात्र समुदाय का कर्तव्य है कि वे खुद और अपने आस-पास के समाज को भी अपने फर्ज़ों, अधिकारों के प्रति जागरुक बनायें तभी छात्र सही मायने में समाज के नागरिक की भूमिका के तौर पर खुद के साबित कर पाएंगे। कबीर ने कहा है- "जन्म मिला है हीरे का, मत कंकड़ में तोल।"

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