Thursday, September 20, 2007

आस्था, विज्ञान और इंसान...

रामसेतु मसले पर राजनीतिक रोटियां सेकने की कवायद जोरों पर है। सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामें में राम और रामायण के अस्तित्व पर ही सवाल खड़े किये गये। लोगों को विरोध को देखते हुए सरकार ने दूबारा हलफनामा दायर अपनी गलती मानते हुए हलफनामें के विवादित हिस्से को वापस ले लिया। उधर बीजेपी को अगले चुनाव के मद्देनज़र एक नया एजंडा मिल गया है। लेकिन इन सब से परे आदमी अपनी ज़िन्दगी को आस्था और विज्ञान की पटरी पर दौड़ाता सफर तय करता है। इसी पर नज़र डाल रहे हैं शेखर आनंद जी
विज्ञान और आस्था के बीच कोई सेतु नहीं है। दोनों नदी के दो किनारे हैं। जो आपस में कभी नहीं मिलते। इतना ज़रुर है कि दोनों किनारों के बीच ज़िन्दगी पानी की तरह बहती है। वो कभी आस्था से किनारा करती है कभी विज्ञान से। लेकिन ज़िन्दगी आगे बढ़ती है बिल्कुल नदी की धारा की तरह। नदी के एक किनारे पर विज्ञान सोचता है कि धारती पर पानी कहां से आया। विज्ञान पानी की एक बूंद लेकर उसके अस्तित्व तालाशता है। प्राकृतिक रहस्यों को जानने समझने के लिए, वो ऊंचे पहाड़ों पर चढ़ जाता है, गहरे समुद्र में उतर जाता है। विज्ञान लगातार जीवन की उत्पति के रहस्यों को जानने के लिए नये-नये तर्क को काटता हुआ उसके सफर को और लंबा करता है। ब्रम्हाण्ड के रहस्यों को खोजता विज्ञान इतने रहस्यमयी तरीक़ों से आगे बढ़ता है कि अपनी असल खोज से अलग, वो कई रहस्यों का रहस्य जान चुका है। उसी नदी के दूसरे किनारे पर आस्था किसी तीसरी ताकत पर भरोसा करती है। ये भरोसा उसे ऊंचे पहाड़ों से गहरे समुद्र तक एक परंपरा में बांध देता है। ये परंपरायें सदियों तक आने वाले कल की धरोहर होती हैं। आस्था और विज्ञान के दो किनारों के बीच, बहती नदी कई बार चट्टानों से टकराती है। नदी बनने से पहले वो झरने सी गिरती है। लेकिन गिर कर भी उसका अस्तित्व नष्ट नहीं होता। वो पहले से ज्यादा ताकत और उपयोगी होकर आगे बढ़ती है। और उसके हर बहाव के साथ बनते है विज्ञान और आस्था के नये-नये किनारे। नदी किसी एक के फायदे के लिए नहीं... सबके लिए आगे बढ़ती है। लेकिन अपना फायदा तालाशती इंसानी फितरत हर बार नदी पर एक सेतु बनाती है। आस्था के किनारे खड़े होकर इंसान रामायण को पढ़ता है, उसे राम भी दिखते हैं, सीता का हरण भी दिखायी देता है और रामसेतु भी। आस्था के किनारे पर खड़ा वही इंसान जब विज्ञान के किनार पर पहुंचता है तो उसकी दिलचस्पी धरती के बनते बिगड़ते स्वरुप और उसके रहस्य को जानने समझने में हो जाती है। उसे ना राम दिखते हैं, ना रामायण और ना कोई रामसेतु। विज्ञान के किनारे से उसे पत्थरों की एक लम्बी रेखा दिखायी देती है। जिसे वो एडम ब्रिज कहता है। अपनी बात को साबित करने के लिए वो किसी रामायण को नहीं अपने तर्कों को पैदा करता है। उन्हीं के सहारे वो तीसरी ताकत के अस्तित्व को नकार देता है। यहीं से इंसान के अहं का टकराव शुरु होता है। वो प्रकृति को जीतने के लिए कभी नदी पर बांध बना देता है। कभी अपनी बनायी मशीनों से किसी एडम ब्रिज को तोड़ नया रास्ता बनाने लगता है। दूसरी तरफ आस्था के सागर में गोते लगाता इंसान अचानक जमीन पर आकर पत्थरों से अपनी ही बनायी चीज़ों को तोड़ना शुरु कर देता है। और इन दोनों के बीच लगी आग में आम आदमी से अलग तीसरी दुनिया में रहने वाले नेता अपनी रोटियां सेकने लगते हैं।

Friday, August 31, 2007

हादसे, हंगामा और उसकी असलियत

बुधवार को जश्ने शबेबरात का माहौल उस वक्त भड़क उठा जब एक ट्रक ने चार लोगों को कुचल दिया। फिर क्या था देखते ही देखते शहर की फिजा बिगड़ गयी। चार लोगों के मौत से गुस्साए लोगों ने जमकर तोड़फोड़ की। लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या आगजनी और तोड़फोड़ से पीड़ित परिवार को संतावना मिल जाएगी। हंगामा बरपाने वाले लोगों ने जो एक जुटता सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने के लिए दिखाई वो पीड़ित परिवार के मदद के लिए क्यों नहीं। अपने को हमदर्द बता कर हंगामा बरपाने वाले लोगों में से कोई उस पीड़ित परिवार का सहारा बनेगा जिसने हादसे में अपना लाल खो दिया। इस तरह के हादसे बताते हैं कि अब मौत के बाद सन्नाटा नहीं पसरता। इन्हीं सब पहलओं पर नज़र डाल रहे हैं शेखर आनंद त्रिवेदी
मुहब्बत के मिसाल को कलेजे से लगाये बैठा शहर जल उठा। जो नज़ारा टेलीवीज़न पर हमने आपने देखा तो कलेजा कांप गया। वो शबेबरात का रुहानी नशा था। जब आगरा का आम शख्स अपने पुरखों को उनकी मज़ार पर रोशनी कर ढ़ूढ रहा था। तभी चार लोग हादसे का शिकार हो गए। रफ़्तार से आते ट्रक ने चार लोगों को मौत की नींद सुला दिया। फिर क्या था हंगामा बरपा। फिर आग लगी। पत्थर बरसे। इंसान अचानक शैतान बन गया। सूरज की रोशनी को दंगे, धुंयें और गुबार ने ढक लिया। दिन चढ़ते-चढ़ते बवाल और बढ़ा। पुलिस कुछ और बेबस हुई। लाठी-डंडों से बात नहीं बनी तो हवा में गोलियां चला दी। बवाल आग की तरह फैला। एक इलाक़े से दूसरे इलाक़े को अपनी चपेट में लिया। नतीजा आगरा शहर के छह थानाक्षेत्रों में कर्फ्यू लगाना पड़ा। लेकिन अब तक कई बड़े सवाल पनप चुके थे। क्या हादसे बताकर होते हैं। यकीन से कहा जा सकता है नहीं। लेकिन हादसों के बाद जो मंजर बना क्या उसे भी हादसा माना जा सकता है। ये सवाल उस भरोसे को हिलाता है जिस भरोसे के साथ शबेरात के मौके पर लोग बेखौफ अपने पुरखों की मज़ार पर थे। जो लोग रुहानियत का अहसास लिये थे, वो अचानक हैवानियत का मंज़र कैसे खड़ा कर सकते हैं। अब इस बात पर बहस हो चली है कि जाने अंजाने हमारे आपके बीच कुछ ऐसे लोग जगह बना चुके हैं जो दरअसल हमारे आप जैसे हैं नहीं। उनकी फितरत का अंदाज़ा लगाना मुश्किल हो रहा है वो बस ऐसे ही किसी हादसे का इंतज़ार करते हैं। जब नफरत और बदले की आग को भड़काया जा सके। आगरा की घटना से कुछ दिन पहले कुछ कांवड़ियों की हादसों में मौत के बाद अलग-अलग जगहों पर कुछ ऐसा ही नज़ारा बना। तब भी सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया। नुकसान पहुंचाने वाले असली तत्व आज भी पुलिस की पकड़ से बाहर हैं। मक्का मस्ज़िद बम धमाके के बाद भी तनाव पनपने से ज़्यादा भड़काया, हुसकाया और उकसाया हुया नज़र आया। नंदीग्राम, सिंगूर मामले में भी राज्य सरकार बाहरी तत्वों का हवाला देती नज़र आई। कुछ ये ही नज़ारा गोहाना कांड में भी देखने को मिल रहा है। एक के बाद एक होते ये हादसे बता रहे हैं कि जिस काम को आतंकी धमाकों से पूरा नहीं कर पाए उसे कुछ ऐसे लोग योजनाबद्ध तरीक़े से अंजाम दे रहे हैं। कि बड़ी-बड़ी एजंसियां भी सुराग नहीं लगा पा रही हैं।

Saturday, July 21, 2007

राष्ट्रपति पद की गरिमा और इस बार का चुनाव

अपनी पाती...
देश की पहली महिला राष्ट्रपती के तौर पर शपथ लेगीं। कांटे का माना जा रहा राष्ट्रपति चुनाव कमोबेश एकतरफा ही रहा। यानी अंतर्रत्माएं प्रतिभा पाटील के लिए बोलीं। भारतीय इतिहास में ये पहला मौका है जब किसी महिला को देश का पहला नागरिक बनने का मौका मिला है। ये न सिर्फ हिन्दुस्तान के करोड़ो महिलाओं के लिए गर्व की बात है बल्कि तमाम देश वालों के लिए खुशी का लम्हा भी। देश के सबसे बड़े संवैधानिक पद पर प्रतिभा पाटील काबिज हो चुकी हैं। लेकिन इस बार के राष्ट्रपति चुनाव के दौरान जिस तर से आरोप-प्रत्यारोप का दौर चला वो पिछले चुनाव में देखने को नहीं मिला। इस गौरवमई पद के लिए जिस तरह से एक दूसरे पर किचड़ उछालने का दौर चला वो काफी दुखद रहा। देश के राजनेता राष्ट्रपति पद की गरिमा को धूल-धूसरित करने में जुटे रहे। आजाद भारत के छह दशक लंबे इतिहास में यह पहला मौका है, जब राष्ट्रपति नाम की संस्था पर सरेआम छींटाकशी की गयी। राष्ट्रपति पद के लिए जब से प्रतिभा पाटील का नाम यूपीए की तरफ से सामने आया तो कई सवाल खड़े हुए। किसी ने कहा-ये वफादारी का सिला है। तो किसी ने वामपंथियों को चित्त करने की चाल बताया। प्रतिभा पर तरह-तरह के आरोप भी लगे। एक सहकारी बैंक के खातेदारों के पैसे गबन करने का मामला उछला। तो चीनी मिल की खातिर बैंक से लिए करोड़ो रुपए के कर्ज को न लौटाने का आरोप भी लगा। इतना ही नहीं पाटील पर हत्या के आरोपी अपने भाई को बचाने का आरोप भी लगा। विपक्ष ने उन पर वेबसाइट भी लॉच किया। ऐसा नहीं कि आरोपों का दौर एक तरफा रहा। भैरो सिंह शेखावत पर भी जमकर कीचड़ उछाला गया। एनडीए पर पलटवार करते हुए यूपीए न शेखावत की नज़दीकियां संघ से बतायी। साथ ही उन्हें एक बागी सिपाही भी कहा गया। घोटालों के आरोप शेखावत पर भी लगे। दोनों तरफ से प्रतिभा और शेखावत के राजनीतिक और निजी ज़िन्दगी के सफर के अनछुए और विवादित पहलुओं को ढ़ूढ कर किताब की शक्ल दी गई और उसे सरेआम किया गया। बहरहाल देश के तेरहवें राष्ट्रपति का चुनाव अगर देश की पहली महिला राष्ट्रपति के लिए याद किया जाएगा तो इस चुनाव में की गयी छींटाकशी भी कभी ना भरने वाले जख़्म की तरह बनी रहेगी। हां ये उम्मीद जरुर की जा सकती है कि आगे के चुनावों में ये जख़्म फिर हरे ना किए जाएं।

Wednesday, July 11, 2007

आईए उनकी याद में एक शमां जलाएं...

शेखर आनंद त्रिवेदी जी एक बार फिर 'मेरा वतन' के पाठकों से रुबरु हुए हैं। इन्होंने पिछले साथ मुंबई में हुए उस ख़ौफ़नाक हादसे की पहली बरसी पर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की है। उस हादसे में कई मासूम बेवक़्त मौत के मुंह में समा गये। आईए शेखर जी के साथ हम सब भी उन सबों की याद में यादों की एक शमां जलाएं।
कुछ देर के लिए आपनी आंखों को बंद कीजिए। महसूस कीजिए कि आप मुंबई में हैं। महसूस कीजिए भागते दौड़ते इस शहर की रफ़्तार को। महसूस कीजिये एक भरेपूरे शहर में बेहिसाब भीड़ के बीच अपने अकेलेपन को। लेकिन ग्यारह जुलाई दो हज़ार छह को हुए सिलसिलेवार सात धमाकों ने इस बेपरवाह शहर की रफ्तार को रोक दिया। ठीक एक साल पहले। आज ही के दिन। जी हां ग्यारह जुलाई साल दो हज़ार छह। एक के बाद एक सात धमाके। निशाने पर मुंबई लोकल। मुंबई की लाइफ़ लाइन। लेकिन ज़िन्दगी इसी लोकल पटरी पर खून से लथपथ हो गयी। इस शहर ने महसूस किया मौत का सन्नाटा। एक-दो नहीं दो सौ नौ जानों की ख़ामोशी। जिन्हें कतई एहसास भी नहीं था कि मौत कैसे और कब दबे पांव इनकी बोगी में दाख़िल हुयी। जिस रेल से ये लोग अपनी ज़िन्दगी के सफ़र को रोज़ाना आगे ले जाते थे। वही एक झटके में ज़िन्दगी इनके जिस्म से निकाल ले गयी। जो मारे गए उनके परिवार जीते जी मर गये। लेकिन शहर की रफ़्तार को देखिये। बड़ा सवाल दहशत के वो धमाके नहीं, ज़िन्दगी को वापस पटरी पर लाने का था। क्योंकि यही इस शहर की हक़ीक़त भी है और फ़साना भी। रेल विभाग उड़ी हुई बोगियों को हटाने में लगा। अपनी पटरियों को दुरुस्त करने में लगा। पुलिस, प्रशासन आतंकी घटना के बाद के हालात को संभालते दिखा।
नेताओं ने संयम बरतने की सलाह देना शुरू कर दिया। खुफ़िया तंत्र सांप निकलने के बाद लकीर को पीटता दिखा। धमाकों के कुछ घंटों के बाद ही शहर अपनी रफ़्तार को पकड़ चुका था। अगली सुबह तो बिल्कुल आम सुबह की तरह रही।
अख़बार के पन्ने घटना का ब्योरा दे रहे थे। लोग अपने काम के लिए बिलकुल वैसे ही निकले जैसे कुछ हुआ ही न हो। सरकार अपने रोजमर्रा के काम निपटाने लगी। पुलिस-प्रशासन और खुफ़िया तंत्र पन्नों पर उकेरी हुयी तस्वीरों के सहारे बैठ गया। कोई बड़ी गिरफ़्तारी, कोई ठोस सरकारी पहल, आम मुंबई वालों के चेहरे पर कोई शिकन किसी तरह का कोई अफ़सोस, अफ़सोस कि नहीं दिखा। ये कैसी संवेदनहीनता है जो किसी हादसे के बाद ना तो दिलों में खौफ़ पैदा करती है, ना ही इतना वक़्त देती है कि जो गुज़र गये उन पर दो आंसू भी खर्च किये जाएं।

Tuesday, July 10, 2007

दिब्याशु जी ने पहली बार 'मेरा वतन' में दस्तक दी है। मीडिया को काफी करीब से जांचा और परखा है। फिलहाल एक राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल से जुड़े हैं। इनके बारे में ज्यादा कुछ बताने की जरुरत नहीं। इन्होंने अपनी पाती में अपना अपने बारे में पूरा लिखा है। मानों इनकी करियर की जद्दोजेहद एक खुली किताब है। जो चाहे पढ़ सकता है। बिना किसी संपादन के उनके लेख को प्रकाशित कर रहा हूं।
आज ऑफ होने की वजह से सोचा कि कुछ लिखा जाए, एक जन्म सिद्ध कर्म जो पिछले कुछ महीनों से भौतिक आलस्य के कारण संभव नहीं हो पा रहा है । तो पहले अपना परिचय ही खासकर मेरा वतन के पाठकों के लिए । नाम है दिब्यांशु , शहर है देवधर। अपने को देवधर का जरुर बताता हूं , वजह साफ है कि जिस पेशे में मैं हूँ यानि खबरिया चैनलों की नौकरी कर रहा हूं इसमें कई बडे चैनलों के शीर्षस्थ पदों पर देवधर के सपूत विद्यमान हैं । हालांकि ज्यादातर के बारे में यही विख्यात है उन्हें अपने अलावा और किसी की चिंता नहीं रहती । फिर भी इनके साथ अपने को जोड़ने का एक प्रयास जरुर करता हूं । नाम बताने में संकोच और डर दोनों है, क्यों, इसकी वजह लोग खुद समझे। साल 1997 में दिल्ली आया था आईएएस बनने के लिए, विषय था इतिहास और हिंदी साहित्य, सीनियर्स ने बताया कि आईएएस बनना है तो उसी की तरह अभी से सोचो तुम्हारी कंडीशनींग होनी चाहिए वैसी । पूरे 5 साल अपने को जिलाधिकारी समझता रहा ...... अभी तक यह दुर्गुण कभी-कभी अपनी झलक दिखला जाता है, जिसकी परिणति मित्रों के पास नौकरी की याचना के रूप में ही होती है । खैर इन 5 साल में 2 बार धौलपुर हाउस में इन्टरव्यू दे आया । कुछ दिनों तक मित्रों को गर्व से बताता रहा कि कट ऑफ से 7 नंबर कम रहा तो कभी 13 नम्बर कम रहा । इसी बीच घर से ख़बर भी आती रही कि आज बरतुहार आये थे लड़की इकोनोमिक्स में एम.ए. कर रही है तो बी.एस सी मैथ्स है ... लगा शादी कर लेंगे तो खिलाएंगे क्या? मित्रों ने कहा अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है कहीं से एमबीए वगैरह कर लो अभी तो 25 वर्ष ही हुआ है। 10-15000 की नौकरी मिल जाएगी, हिम्मत करके घर गया, बाबूजी से कहा तो कहने लगे पांच साल दिल्ली में रहे पूरे 6 लाख रुपये खर्च हुए ... मिला क्या? पैसा तुमने बर्बाद किया तुमने पढ़ाई की ही नहीं अब फिर 3 साल एमबीए करोगे फिर 4-5 लाख लगेगा सोच लो। साक्षात्कार के लिए 2-2 बार बुलावा आया, बुलावा पत्र अभी भी ब्रीफकेस में पडा मुंह चिढा रहा था, कागज ख़राब न हो जाए इसलिए लेंमिनेशन करवा लिया था, महंगा वाला सदर बाजार जाकर। बार-बार निराला की कविता याद आती थी। दुख ही जीवन की कथा रही ... । हाँ एक घटना भी इसी वक्त हुई कि पिछले 2 वर्षों से जिस रुपसी के प्रेम जाल में उलझा हुआ था उन्हें मुझमें कई कमियां नज़र आने लगीं। मसलन में उनके फूआ जी के प्रति असम्मानजनक व्यव्हार करता हूं। इसलिए वो मुझसे शादी नहीं करना चाहती है। और उनकी माता जी जो कभी दो दिन तक मेरे फोन न आने से बिचलित हो जाती थी और खुद ही फोन करके पूछने लगती थी। कि “............” को फोन क्यों नहीं कर रहे है। उन्होंने एक दिन ये शुभ सूचना दी कि “.......” की शादी फला जगह ठीक हो गई है। मेरे आगे वो दृश्य घूम गया जब हम दोनों को आलिंगनबद्ध देखकर माता जी नज़रें बचाकर निकल गई थीं। वजह साफ थी लड़का IAS बनने वाला था। लौटते है टीवी की नौकरी पर, करियर को लेकर जो चिंता थी, उसे खत्म किया बड़े भाई तुल्य एक व्यक्ति ने जो झारखंड के एक प्रतिष्ठित अख़बार में वरिष्ठ पद पर कार्यरत थे। एक शादी में हम दोनों शामिल होने गए। तो उन्होनें कहा कि देवघर में हमारे अखबार का संस्करण प्रकाशित हो रहा है। श्रीमान ‘अ’ संपादक बनकर आ रहे है। उनसे मिलकर मेरा नाम कहना, वो तुम्हे नौकरी पर रख लेगा। ‘अ’ जी से मिला, उन्होने नौकरी पर रखा भी। वेतन तय हुआ दो हजार रूपया महीना। याद आया, दिल्ली में पढ़ाई के दौरान चार हज़ार रूपया तो कमरे का किराया देते थे। पहले ही दिन ‘अ’ जी ने कुर्तिदेव का लेआउट पकड़ा दिया और कहा टाईप करना सीखिए। इससे पहले कि मैं हेंड फ्री टाइपिंग कर पाता ‘अ’ जी नौकरी छोड़कर चले गये। मुझे अखबार में जनरल डेस्क का इंचार्ज बनाया गया। पहला और अंतिम पेज मैं ही बनाता था। पत्रकार बनते ही पिताजी से पैसा लेकर मोबाइल खरीदा। पहले महीने में ही ढाई हज़ार का रिचार्ज कूपन डलवाया। महीने की पहली ताऱिख को सैलरी मिली दो हज़ार रुपये। आठ नौ महीने गुजरे तो अपने को तौलने लगा .... अखबार के संपादक तक ज्ञान के कायल थे..... मित्रों ने कहा कि टी.वी. में ट्राई करो..... तुम्हारे अंदर टाइलेंट है । याद आया अरे आजतक के एक्ज़क्यूटिव प्रोड्यूसर फलां जी तो हमारे स्कूल में पढ़ते थे। वो तो जरूर मदद करेंगे नही तो पुराने दोस्तो से कहलवायेंगे। फिर वहां एमके जी भी है दूरदराज की रिश्तेदारी भी है उनसे...... काम हो जाएगा.... इसी बीच श्रीमान अ जी .... जिनसे लगातार मैं फोन पर संपर्क में था .... ने बताया कि उनकी नौकरी सच दिखाने वाले चैनल मे हो गई है। उनके लागातार आश्वासनों, खुद के संबंधो और कुछ भाग्य पर भरोसा करके एक बार फिर दिल्ली वापस आ गया..... नौकरी की तलाश में। दिल्ली आने के दसवें ही दिन एक एनजीओ में नौकरी मिल गई। सूचना के अधिकार पर काम करने वाली ये संस्था डॉक्यूमेंटरी और विजुअल पैकेजिंग का काम करती थी। सेटअप छोटा था लेकिन वेतन अच्छा था। दस हज़ार रुपये महीना...... लेकिन किस्मत में नारी से संताप लिखा था सो प्रेमिका से धोखा खाये छह महीना भी नही बीता था कि एनजीओ की कर्ता-धर्ता एक युवति का कोपभाजन बन गये। दरअसल मोहतरमा कुछ ज्यादा ही नफ़ासत पसंद थी जबकि मैं भदेस अभिजात संस्करण का व्यक्ति था। जैसे तैसे महीना बीता और मैने नौकरी छोड़ दी। उन दिनों एक नया चैनल शुरू हो रहा था जो आज कल फिर नया होने को लेकर चर्चाओं में है। एक महीने में ही जितना हो सका था.... टीवी सीखने की कोशिश की थी । उपकरणों के साथ संबंध मात्र इतना ही था कि एनजीओ की कर्ता धर्ता महोदय शूट पर जाते हुए कैमरा मैन के साथ मुझे ट्राइपोड लेकर भेजते थे । ट्राइपोड इधर से उधर करने में ही मै अपना रुतबा प्रोड्यूसर से कम नही समझता था। भूख पर बन रही एक फिल्म के सिलसिले में जब उन्होनें मुझे एक झुग्गी में भेजा तो साढ़े तीन फीट के दरवाजे के अंदर जो अंधेरा था वो मेरे बॉस के चेहरे पर पसरी लालिमा भरी सफेदी से कुछ कम ही डरावना था। खैर मैने नये आ रहा चैनल में प्रयास शुरू किया और जुगाड़ की बदौलत नौकरी पा भी गया। नया ऑफिस.... बड़ा ऑफिस बिल्कुल साफ सुथरा...... लगा जीवन का मकसद पूरा हो गया ..... पहले ही दिन एचआर ने सबसे मिलवाया .... हैलो हाय हुई, लड़कियों से हाथ मिलाया। अबतक तो पांच छह से ही हाथ मिलाने का मौका मिला था। आज एक ही दिन में पंद्रह बीस से.... आखिर ये प्रोफेशनल दुनिया है। खैर.... य़हां हमारी बॉस थी एक महिला ....नाम मैडम एक्स ...... गोरा रंग .... घुंघराले बाल.... नाटा कद । पता चला मैम बीबीसी में काम करती थी ..... डिस्कवरी के लिए प्रोग्राम बनाया है। यहां ईपी हैं.... पूरे दस आदमी की टीम थी। मैम दिन में तीन बार मीटिंग लेती थी । शुरू शुरू में अच्छा लगा कॉरपोरेट कल्चर यही है। सोचा यहां सीखने का पूरा मौका मिलेगा। फिर छह आठ महीने में जुडाड़ लगाकर किसी अच्छे चैनल में चला जाउंगा। मीटिंग में मैम अपने रौद्र रूप में रहती थी। खालिस अंग्रेजी बोलती थी, चुटकी भी अंग्रेजी में बजाती थी। बाहर निकलकर मै भी वैसी चुटकी बजाने की कोशिश करता। एक दिन मेम ने कहा कि चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया को स्टूडियो पैनल डिस्कशन में बुलाओ । मै हतप्रभ आखिर इतनी समझ भी नही है...... फिर धीरे धीरे साफ हुआ। मेम के पूरे व्यक्तित्व में हवा भरा हुआ था कायदे से इन्हे रिसेपशनिस्ट की नौकरी भी नहीं मिलनी चाहिए। चैनल की दुनिया में इन्हे कोई भी आदमी अपनी टक्कर का नही लगता। अक्सर कहती ‘राज... प’ को कुछ नही आता। ‘एनभी टीवी’ में किसी को विजुअल्स की समझ नही है। बीबीसी मेरे कई डाक्यूमेंटरी की स्टाईल फालो करती हैं। मेम के बालों में जितना घुमाव था उससे ज्यादा पेचीदगी उनके दिमाग में थी। जबतक आफिस में होती चैनल के दूसरे लोगों की निंदा और अपनी टीम को लड़ाने की जुगत में लगी रहती थीं। हां एक काम जरूर करती थी ढ़ाई- तीन मिनट के अपने पैकेज में वॉयस ओवर वो खुद करती थी। उनका मानना था कि वही अपनी आवाज से स्टोरी को फिलिंग दे सकती थी। इस पूरी प्रक्रिया में उनका साथ देने के लिए मौजूद रहते थे मिस्टर ‘वाई’। टीम और चैनल में उनकी उपयोगिता आज तक मेरी समझ में नही आय़ी। मिस्टर ‘वाई’ मेम के साथ ही आते और साथ ही जाते। आउट डोर शूट पर भी दोनो साथ साथ। बिल्कुल बादशाह बेगम की जोड़ी। सूत्रो ने बताया कि ‘वाई जी’ मैम के पुरूष रखैल थे। इन दोनों की जोड़ी उन चंद आत्म मुग्ध लोगों में थी जो हस्तमैथुन से भी संतान पैदा करने की कल्पना करते रहते हैं। एक अन्य महिला जो चैनल में काफी प्रभावशाली थी उनके बारे में भी अक्सर सुनने को मिलता। मेम इनके साथ...... तो उनके साथ । जल्द ही मैडम ‘एक्स’ से मेरा मोहभंग हो गया। उपर से विधाता ने नारी से संताप का विधान कर ही रखा था । मेरे पूरे दिन की मेहनत को मेम मेरे सामने रद्दी की टोकरी में फाड़ कर फेंक देती थी। मीटिंग में मुझे बेइज्जत करती और अपने पालतुओं की शेखी बघारती थीं। फिर कैफेटेरिया में बैठ जाती वहां चाया नाश्ते का दौर चलता। मै दूर से तटस्थ भाव से उन सबको निहारता रहता। वहां भी मेरे बारे में ही चर्चा होती। वाई जी कहते मेमे ये भूमिहार है इसका अगला कदम क्या होगा समझना मुश्किल है। दूसरा कहता अरे नही सर ब्राम्हण है वो भी मैथिल अंग्रेजों ने कहा था कि मैथिल ब्राम्हण और कोबरा सांप दोनों एक साथ मिल जाय तो पहले मैथिल ब्राम्हण को मारो। मेम भी मुझे कुचलने में मुझे दिन रात लगी हुई थी। इधर अपने काम और व्यहार से मैने चैनल में कुछ महत्वपूर्ण लोगों से संबंध बना लिया था। चैनल के न्यूज डायरेक्टर मुझे अपने प्रोग्राम की जिम्मेदारी देना चाहते थे। एक सीनियर प्रोड्यूसर मेरा आडिशन करवा रहे थे। उनका मानना था कि एंकर नौलेजबुल होना चाहिए। इस सबके बीच मुझे अपनी कमजोरियों का एहसास था। मुझे लगता था अभी दो तीन साल सीखने की जरूरत है। दो तीन बार मेम से बात करने की कोशिश की उनसे बातचीत बिल्कुल ही बंद थी। लेकिन उन्होंने तय कर लिया था । एक दिन पता चला मेम ने एमडी से कह दिया है कि वो मुझे चैनल में नहीं रखना चाहती। मुझे बाहर कर देना चाहिए। इस बीच दो महत्वपूर्ण चीजे हुई। मेरे शुभचिंतकों ने एमडी को मेरी संभावनाओं और क्षमताओं का हवाला देकर मुझे बाहर होने से रोक लिया................ मुझे किसी सफाई के लिए भी नहीं बुलाया गया। हुआ बस इतना कि मुझे मेम की टीम से हटाकर एक कार्यक्रम की जिम्मेदारी स्वतंत्र रूप से दे दी गई। ये पनिसमेंट था या प्रोमोशन मैं समझ नहीं पाया। यहां एक बात का उल्लेख जरूर कर दूं कि इन्हीं सब के बीच मेरा साक्षात्कार आजतक चैनल पर हो गया था। और वहां से जो सूचना मिल रही थी उसके हिसाब से पंद्रह से बीस दिन के बीच में वहां जाना तय था। अधिक से अधिक एक महीना। प्रारम्भ से ही दो व्यक्तियों का मार्गदर्शन और स्नेह मुझे मिलता रहा। कैरियर के किसी भी महत्वपूर्ण निर्णय का फैसला इन दोनों के परामर्श के बिना संभव ही नहीं। एक तो श्रीमान् ‘अ’ और दूसरे राकेश सर खासतौर पर राकेश सर का आभार व्यक्त करने के लिए पूरा ज़िदगी कम पड़ेगी। जिन्होने मेरे मिस कॉल का जवाब अपनी व्यस्तताओं के बाद भी मुझे फोन करके दिया। इन दोनों से मेरे संबंधों का सेन्ट्रल मेटाफर मेरी श्रद्घा ही रही है न कि किसी अन्य लाभ की अपेक्षा। लौटते है पूरानी घटना पर..... तो एक तो ये सारी बाते मान ली और हामी भर दी कि उन्हें मुझे समझने में भूल हो गई। मैं जो दिखता हूं वो हूं नहीं। अब ये बाते मैडम एक्स के सौदर्य के प्रभाव में हुई या पराठे वाली गली में बैठकर बतकही करते हुए पता नहीं लेकिन ‘अ’ जी से फोन पर बातचीत बंद हो गई। एक दिन खबर मिली कि महोदय हमारे चैनल के बाहर आय़े थे। ख़बर ऐसी ही थी कि स्वर्ग लोक का कोई मंत्री पटना के सब्जी मंडी में घुमने के लिए आये। ‘अ’ जी जिस चैनल में है उसकी नौकरी स्वर्ग प्राप्ति के समान ही मानी जाती है। मैने उन्हे फोन किया, पुछा जब हमारे आफिस आये थे तो हमें बताया होता, आपके दर्शन तो हो जाते। ‘अ’ जी सरल व्यक्ति ठहरे बोले अरे नहीं उधर से गुजर रहा था ... पुस्तक मेला जाना था तो सोचा ‘रा........नी’ जी से मिलता जाऊं। मामला समझ मे आया। रूपसी से मिलने की आकंक्षा तो इंद्रदेव को भी धरती पर खींच लाती है । ये हमारे चैनल में काम करने वाली एक रुपसी थी जिनके कैरियर को लेकर ‘अ’ जी खासे सक्रिय रहे हैं। अपने स्वर्ग वाले चैनल में उनका कई बार टेस्ट करा चुके हैं। इधर मेम मेनेजमेंट पर लगातार दबाव बना रही थी। आखिर जीत मैम की हुई , चैनल के जी.एम. ने मुझे अपने केबिन में बुलाया , चाय पिलाई कहा हम लोगों को तुमसे कोई शिकायत नहीं है तुम्हारे प्रोग्राम को फिलहाल बंद किया जा रहा है, ऊपर से फैसला हुआ है आज 16 तारीख है तुम छुट्टी ले लो और 31 तारीख के लिए अपना रिजिनेशन लिख दो । हालात बदलेंगे तो हम तुम्हें दुबारा बुलाएंगें , सीनियर प्रोड्यूसर बनाकर । जी एम के कमरे से बाहर निकल रहा था तो मेम ‘एक्स’ टकरा गईं उनके चेहरे पर विजयी मुसकान थी । मैम मुझे पहले कभी इतनी खूबसूरत नहीं लगी थी। उनका सामने का हिस्सा कुछ ज्यादा ही आगे निकल आया था। मैं वापस अपनी सीट पर पर गया। कम्प्यूटर पर लिख रहा था ...ड्यू टू पर्सनल रीज़न ...........। मैम सीट के पीछे खड़ी थी कह रही थी आप अभी तुरंत ये सीट छोड़ दीजिये इसपर शेखर जी बैठेंगे स्क्रिप्ट टाईप करनी है इन्हें । मैने जैसे तैसे पूरा किया .... थेंकिगं यू ... दिब्यांशु। सोचा आहत का अपमान प्रोफेशनल बिहेवियर नहीं बल्कि घोर पतन का लक्षण है। उसी दिन रात को साढ़े दस बजे आजतक से फोन आया...... अभी आपका मामला 2-3 महीनों के लिए टल गया है । रातभर अपने को वीडियोकोन टॉवर के लिफ्ट से अंदर बाहर होता देखता रहा। कभी फोर्थ फ्लोर कभी सेवन्थ फ्लोर । सुबह नींद खुली तो एक मित्र ने फोन कर बताया कि उनके चैनल के न्यूज़ हेड ने बुलाया है। शाम को मिलने गया । दूसरे दिन रविवार था । सोमवार से एक नए आफिस में हूं। ठीक-ठाक चल रहा है । एक शब्द अक्सर हर बात में बोलना सीख गया हूं , अपने सहकर्मियों के संगत से ..... चूतिया । इस शब्द की उत्पत्ति पर जब गौर करता हूं तो सोचता हूं अब नहीं बोलूंगा । दरअसल मेरी स्थिति असाध्य वीणा के उस साधक की तरह है जो अपना सारा अहं उस वीणा को समर्पित कर देता है जिसे आजतक कोई नहीं बजा पाया... अचानक फोन बज उठता है सलाम करने की है आरजू का पोलिफोनिक रिंग टोन फ़िज़ा में गुंजता है..... नंबर देखता हूं तो मुंह से निकल पड़ता है चूतिया और वीणा के तार झनझना उठते हैं। दिब्यांशू

Monday, May 28, 2007

वक़्त के गाल पर थमा हुआ एक आंसू 'ताजमहल'

शेखर आनंद त्रिवेदी अदब व तहज़ीब के शहर लखनऊ से ताल्लुक रखते हैं। मीडिया से काफी वक़्त से जुड़े हैं। समाज में होने वाली उठापटक पर इनकी पैनी नज़र रहती है। हर मुद्दे के जड़ तक जाना न सिर्फ इनकी आदत है बल्की जूनून भी। जुलाई महीने में दुनिया के अजूबा इमारतों के नाम का ऐलान होना है। जिसके लिए वोटिंग हो रही है। इस दौड़ में ताज भी शामिल है। शेखर जी ने ताज के इस इम्तेहान को काफी ख़ूबसूरती से पेश किया है।
वक़्त के गाल पर थमा हुआ एक आसूं। ताजमहल। इंसान की बनायी सबसे ख़ूबसूरत इमारत है ताजमहल। किसी की मोहब्बत की अमर दास्तान। ताजमहल। मुगलकाल का अज़ीमोशान शाहकार। ताजमहल। किसी की मौत पर बना मकबरा है ताजमहल। नदी का सबसे ख़ूबसूरत किनारा है ताजमहल। प्रेमियों के लिए इज़हारे जज्बात है ताजमहल। कहते हैं मोहब्बत के कई रंग होते हैं। मौत का सिर्फ एक। बहुत सारे रंग एक साथ पहिये पर घुमा दें तो सब सफेद नज़र आता है। ताज की संगमरमरी सफेद इमारत बेपनाह मोहब्बत के वो हज़ारों रंग समेटे है जो किसी की मौत के बाद बेरंग हुयी ज़िंदगी को तसल्ली देती है कि चलो तुम नहीं तुम्हारी यादें ही सही। ताजमहल जैसी मोहब्बत की निशानी दुनिया में दूसरी नहीं। शायद इसीलिए कहते हैं कि हर प्यार करने वाला शख्स एक बार ताजमहल देखने की ख्वाहिश ज़रुर रखता है। ताज की शान मे बहुत कुछ लिखा गया। बहुत कुछ गाया गया। फिल्में भी बनी। ताज के नाम पर बहुत कुछ बेचा गया। ताज के नाम पर बहुत कुछ ख़रीदा गया। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने जब ताज को देखा तो बोले दुनिया में दो ही तरह के लोग हैं एक वो जिन्होंने ताज को देखा है, एक वो जिन्होंने ताज को नहीं देखा। पाकिस्तान से भारत आए मुशर्रफ ने ताज को देख कर कहा मोहब्बत का ये मकबरा बेमिसाल है।
बाजारवाद के दौर में अनमोल ताज का अपना एक मोल है। दरअसल तरक्की पसंद दुनिया ने तकनीक के सहारे आज कई इमारते खड़ी कर ली। अब वो इतिहास की इमारतों को दफन करना चाहता है। वो अपनी क़ामयाबियों के नए अध्याय लिखना चाहता है। यहां भी वो तकनीक का सहारा ले रहा है। कोई एसएमएस, कोई मेल, कोई कॉल किसी इमारत को दुनिया का सबसे बड़ा अजूबा बनायेगी। वो इमारतें दुनिया के उन सात अजूबों में शुमार होगीं जिन्हें सबसे ज्यादा लोगों का वोट मिलेगा। कभी बीस हज़ार लोगों के चालीस हज़ार हाथों से बनी ताज की इमारत अनगिनत आंखों में बसी। अब उन्हीं यादों के सहारे वो अजूबा बन रही इमारतों से दो-दो हाथ कर रही है। ताजमहल की इमारत चाहती है कि भारत समेत दुनिया भर से उसके दीदार करने वाले उसे हैसला दें। अपनी यादों में बसे उसके नाम को इतनी बार लिखें कि बाकी सारे नाम छोटे पड़ जाएं। नयी अजूबा इमारतों की दौड़ में ताज पिछड़ा है। उसे अब तक केवल दो फीसदी वोट मिले हैं। इतिहास का आइना बनी कई इमारतें नए प्रेमियों के नाम से गुदी मिलती हैं। मेल और एसएमएस के दौर में प्रेमियों की चैटिंग खत्म नहीं होती। हर कोई चाहता है कि उसकी मोहब्बत अमर प्रेम की बेल चढ़ जाए। लेकिन ताज पिछड़ रहा है। उसे आपका समर्थन चाहिये। इसलिए नहीं कि वो इमारत अगर अजूबा ना रही तो खत्म हो जाएगी। बल्कि इस लिए कि अगर वो जीत गई तो भारत समेत दुनिया भर के प्रेमियों की मोहब्बत भी जीत जाएगी। दुनिया एक बार फिर जानेगी कि मोहब्बत अनमोल होती है। वो किसी भी दौर में कमज़ोर नहीं पड़ती। फिर भले ही वो किसी इमारत की शक्ल में वक़्त के गाल पर थमा हुआ एक आंसू ही क्यों ना हो।

Sunday, May 27, 2007

छात्र की नागरिक भूमिका

यतेन्द्र शर्मा युवा पत्रकार है। युवा राजनित और करियर पर लिखते रहते हैं। पहली बार इन्होंने मेरा वतन में दस्तक दी है।
पुरानी शिक्षा प्रणाली और नई शिक्षा प्रणाली में आमूलचूल बदलाव आया है। चाहे शिक्षण परिसरों की बात हो या शिक्षण कार्य के तौर-तरीक़ों की। सभी में किसी न किसी तौर पर बदलाव देखने को मिला ही जाता है। पहले विद्यार्थी पढ़ने के लिए गुरुकुल में जाते थे। गुरुकुल व्यवस्था में रहने, खाने, पढ़ने और शारीरिक व्यायाम जैसी सभी सुविधाएं होती थीं। इनका उदाहरण हमारे प्राचीन ग्रंथों व इतिहास की किताबों से मिलता है। पहले विदेशों से छात्र ऊंची पढ़ाई के लिए हमारे देश में आते थे। हमारे यहां के तक्षशिला, नालंदा जैसे कई विश्वविद्यालय गुरुकुल पद्धति के श्रेष्ठ उदाहरण थे। इनमें शिक्षा हासिल करना बहुत बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी। देश की आज़ादी के बाद पिछले 60 वर्षों में शिक्षण व्यवस्था के स्वरुप में तेजी से बदलाव हुआ है। पहले मंडलों में एक या दो कॉलेज होते थे और विद्यार्थी का ज्यादा वक़्त परिसर में बितता था। लेकिन स्वतंत्रता के बाद अब देश-विदेश के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी, सर्वागीण विकास व प्रतिस्पर्धा की भावना जागृत होने की वजह से नए-नए कॉलेजों की स्थापना हुई। जिनमें आकर्षण के चलते उनमें पढ़ने के लिए छात्र समुदाय में व पढ़ाने के लिए अभिभावक समुदाय में ललक पैदा हुई। लेकिन मौजूदा वक़्त में तालीम हासिल करने के लिए स्टूडेंट को कॉलेज परिसर में पहले की तरह चौबीस घंटे न रहकर कुछ वक़्त ही गुजारना पड़ता है। जिसकी एक ख़ास वजह कोचिंग क्लासेज़ और ट्यूशन का भी होना है। लेकिन गरीब तबके के छात्र-छात्राएं तो इससे भी महरुम है। दिनों-दिन मंहगाई में हो रहे इज़ाफे की वजह से छात्र समुदाय को कई तरह की परिशानियों का सामना करना पड़ता है। जिसकी वजह से छात्रों की भूमिका समाज में नागरिक भूमिका के रुप में उत्पन्न हुई। छात्र को कल का नागरिक माना जाता है लेकिन सही मायने में देखा जाए तो छात्र आज का नागरिक है न कि कल का। इसके लिए हमें पिछले घटनाओं के परिपेक्ष में जाना होगा- दुनिया में कई आंदोलन हुए है चाहे वो वियतनाम का आंदोलन हो या फ्रांस का आंदोलन, सभी की शुरुआत छात्रों के ज़रिए उठाई आवाज़ और उनके संघर्ष से हुई है। और इन आंदोलनों की प्राप्ती अपने उद्देश्य की प्राप्ती अर्थात सही नेतृत्व में सत्ता को सौंपने से ही हुई। अगर भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को ही लें तो जितन क्रांतिकारी या महापुरुष हुए उनमें से ज्यादातर अपने छात्र जीवन से ही संघर्ष करना शुरु कर दिया था। अगर हम पुरातन काल में भी जाते हैं तो देखते हैं कि त्रेता युग में भी छात्र जीवन व्यतीत करते हुए राम व लक्ष्मण ने ऋषियों के यज्ञों व आश्रमों की रक्षा कर समाज के नागरिक जीवन के कर्तव्यों का ही परिचय दिया था। इन सभी आंदोलनों, संघर्षों व तथ्यों से यही साबित होता है कि छात्र आज का नागरिक है न कि कल का। और फिर आठारह साल की उम्र के बाद संविधान भी मताधिकार व इक्कीस साल के बाद चुनाव लड़ने का अधिकार हक देता है। आमतौर पर इस उम्र में अधिकांश व्यक्ति छात्र जीवन ही जी रहे होते हैं। और ये अधिकार तो देश के सम्मानित नागरिक होने का भी एहसास कराते हैं।
इसलिए छात्र समुदाय को अपनी भूमिका को सामने लाकर अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह करना भी आज के हालात को देखते हुए जरुरी है। क्योंकि आज विश्व में आतंकवाद का विकृत व विकट रुप सामने आ रहा है। लेकिन क्या हमने कभी ये सोचा है कि ये आतंकवादी कौन हैं? ये कहां से आते हैं? ये कहां रहते हैं? ऐसे कई सवाल हैं । अगर हम इन पर गौर करें तो पाएगें की ज्यादा तर आतंकी आज के भटके हुए छात्र हैं जो हमरे कॉलेज परिषरों, हॉस्टलों में पनाह लेते हैं। कुछ स्वार्थी तत्व इनकों धर्म व जात-पात में भेदभाव की राजनीति करते इनकों गुमराह कर अपना उल्लू सीधा करते हैं। इसलिए छात्र समुदाय को चाहिए कि ऐसे व्यक्तियों पर नज़र रखकर उन्हें खुद से दूर रखें। इस नाते छात्र एकता को जगाना होगा। हमारा दायित्व बनता है कि इस आतंकवाद का कब्रिस्तान भारत में बनाया जाए। इस लिए छात्रों को समाज में पनप रहीं अनेक कुप्रथाओं के ख़िलाफ़ जागरुकता का परिचय देना होगा। क्योंकि ज्यादातर अपराध बिना तरुण(नौजवान) की सहमति के हो ही नहीं सकते हैं। जिनमें ख़ास तौर पर दहेज़ हत्या जैसी बुराईयां शामिल हैं। इसलिए छात्र समुदाय का कर्तव्य है कि वे खुद और अपने आस-पास के समाज को भी अपने फर्ज़ों, अधिकारों के प्रति जागरुक बनायें तभी छात्र सही मायने में समाज के नागरिक की भूमिका के तौर पर खुद के साबित कर पाएंगे। कबीर ने कहा है- "जन्म मिला है हीरे का, मत कंकड़ में तोल।"

Sunday, May 20, 2007

तु भी तो कभी मां बनेगी …

तपन कुमार नीरज भागलपुर बिहार से ताल्लुक रखते हैं। इन्होंने अपने पहले दिल्ली दौरे के अनुभव को हमारे बीच बांटा है।
बात उन दिनों की जब मैं दिल्ली में नया था। दिलवालों की दिल्ली की परिवेश से मैं पूरी तरह अनभिज्ञ था। पत्रकारिता में कैरियर बनाना था, इसलिए मैं भारतीय जनसंचार संस्थान टेस्ट देने जा रहा था। उस समय मैं पटेल नगर में ठहरा था। मुझे पटेल नगर से जे.एन.यू के न्यू कैम्पस में जाना था। जहां आई.आई.एम.सी स्थित है। मैं डी.टी.सी बस में सवार हो गया। बस में भीड़ ठसाठस थी। बैठने की छोड़िए, पैर रखने के लिए इंच भर जगह नहीं थी। भीड़ इतनी कि खड़े रहना युद्ध जीतने जैसा था। उस पर अप्रैल-मई का महीना अलग। गर्मी से सभी बेहाल। खैर किसी तरह मैं एक पैर पर खड़ा हो गया। करता भी क्या इसके अलावे मेरे पास दूसरा कोई विकल्प नहीं था। बस धीरे-धीरे बढ़ रही थी। बस का हेल्पर और ज्यादा सवारियों को चढ़ना चाहता था, इसलिए बार-बार चिल्ला रहा था। आगे बढ़ो - आगे बढ़ो कह कर सवारियों के साथ धक्का-मुक्की कर रहा था। बस ने अब कुछ रफ़्तार पकड़ लिया था। गर्मी और उमस से मुझे नींद आने लगी। बार-बार जम्हाई आ रही थी। नींद न आये, इसके लिए मैंने साथ लाए समाचार-पत्र पढ़ने की कोशिश करने लगा। लेकिन भीड़ चिल्ल-पों और धक्का-मुक्की से निज़ात तो मिले। तभी कुछ पढ़ा जाय। बहुत कोशिश करने पर समाचार-पत्र के विशेषांक का पन्ना मोड़ कर एक हाथ में रख लिया। जैसे ही थोड़ा हाथ उठाने का मौका मिला, मैंने मिले मौके का झट से इस्तेमाल किया। मैं पढ़ने लगा। लेकिन धक्का-मुक्की से पीछा अभी भी छूट नहीं रहा था। मेरे हाथों में पेपर का जो पेज था, उसमें एक कहानी थी। कहानी का शीर्षक था -- "वो तोड़ती पत्थर " । मुझे हाई स्कूल की याद आ गई। नौवीं-दशवीं में एक कविता पढ़ी थी, उसका शिर्षक भी तोड़ती पत्थर ही था। मैं यादों में खो गया। उस कविता की गहराई में और जाता कि एक आवाज़ से मेरी तंन्द्रा टूट गई। जिस आवाज़ से मेरी तंन्द्रा तोड़ी, वह आवाज़ रह-रह कर आ रही थी। मेरा ध्यान बार-बार उसी आवाज़ की तरफ जा रही थी। मैं थोड़ा आगे खिसक गया। अब आवाज़ पहले की अपेक्षा ज्यादा स्पष्ट आ रही थी। आवाज़ से स्पष्ट था कि कोई महिला दर्द से कराह रही है। मेरा ध्यान अब परीक्षा की तरफ नहीं था। मेरा मन बार-बार यह सवाल कर रहा था कि आखिर यह महिला दर्द से चिल्ला क्यों रही है। मन में तरह-तरह के सवाल-जबाव उत्पन्न हो रहे थे। मैं यह जानने को उत्सुक था कि आखिर वह परेशान क्यों है। बस अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ती जा रही थी। मैंने गौर किया कि बस जब-जब हिचकोले खाती, तब-तब महिला और जोर से चिल्लाती। अब मैं कारण जानने के लिए तरह-तरह के कयास लगाने लगा। लेकिन जैसे ही महिला थोड़ा पीछे मुड़ी, मेरी शंकाएं दूर हो गयी। महिला प्रिगनेंट थी। शायद प्रिगनेंसी लास्ट स्टेज में था। इसलिए वह अत्यधिक पीड़ा में थी। वह कातर नज़र से सभी बैठने वालों को देख रही थी। शायद वह चाह रही थी कि कोई उसे बैठने के लिए जगह दे दे। लेकिन वह सिर्फ देखती रही, किसी से कुछ कहा नहीं। उसकी आँखों में दया की भीख नज़र रही थी। पहने हुए कपड़ों से लग रहा था कि वह बेहद ग़रीब है। कपड़ा भी बहुत गंदा। रंग सांवला। बाल उलझे-उलझे। साड़ी मैले-कुचैले। गर्मी का मौसम होने के शरीर से बदबू रही थी। इस कारण वह जहां खड़ी थी, अगल-बगल के सभी यात्री नाक पर रूमाल लिए। खास कर दिल्ली की लड़कियां। सभी लड़कियां आपस में खुसर-फुसर कर रहीं थीं। महिला दर्द से कराह रही थी। उससे दर्द सहन नहीं हो रहा था। उसके पेट के अंदर जो सुनामी कहर बरपा रहा था, उसे वह सहन नहीं कर पा रही थी। उसे किसी की मदद की जरूरत थी। आखिरकार उसने हिम्मत जुटाया और लड़कियों से बोली --- बहन मेरी दशा पर तरस खाओ। मुझे बैठने दे दो। काफी गिड़गिड़ाई लेकिन दिलवालों की दिल्ली की लड़कियों का दिल नहीं पसीजा। सभी ने बुरा-भला कहा। कुछ ने कहा, न जाने कहां-कहां से चले आते हैं। उस महिला का धीरज टूट गया। उसने कहा, "भगवान न करें कि आप सबों को ऐसा दिन देखना पड़े। आखिर तु भी तो सभी मां बनेगी "। इतना कह कर वह फूट-फूट कर रोने लगी। इतने में एक माडर्न सी लड़की ने कहा कि मैं तुम्हारी तरह धक्के थोड़े ही खाऊंगी। इतना कहने के बाद मुँह फेर लिया। वाह री दुनियां। मैं सोचने पर मजबूर हो गया कि आखिर हमारे समाज को हो क्या गया है। मानव इतना असंवेदनशील क्यों हो गया है। किसी के दर्द को समझने के बजाय हम तमाशबीन क्यों हो जाते है। कभी तो हम यह सोच कर देखें कि उस महिला की जगह हम होते तो क्या होता। सभी तो लक्ज़री कारों का उपयोग नहीं कर सकते। आज भी भारत की तीस करोड़ आबादी गरीबी रेखा से नीचे अपना जीवन-यापन करते हैं। मैं उधेड़बून में था। मन में तरह-तरह के विचार उत्पन्न हो रहे थे। दिल कह रहा था कि ग़रीब होना भी एक अभिशाप ही है। उस महिला की दयनीय दशा देख कर मुझे बड़ा कष्ट हो रहा था। उसकी दशा देखकर मुझे फिर से तोड़ती पत्थर की याद आने लगी। मैं विचार में इस कदर खोया था कि मुझे पता भी नहीं चला कि कब बैर सराय आ गया। अब मेरी मंजिल आ गयी थी। दिलवालों की दिल्ली के रूखेपन देखकर मैं सिहर गया। मुझे समझ में नहीं पा रहा था कि अमीरी-गरीबी में इतनी खाई क्यों। क्या ग़रीबों को जीने का अधिकार नहीं है। जीने का हक़ तो सभी को है, न कि सिर्फ अमीरों को। मैं धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हुए, बुझे मन से भारतीय जनसंचार संस्थान चला गया।

Wednesday, May 16, 2007

यूपी में माया की माया...

मायावती उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद पर क़ाबिज हो चुकी हैं। ये पहला मौक़ा नहीं जब मायावती सूबे की मुख्यमंत्री बनी हैं। इससे पहले वो 1995, 1997 और 2003 में मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। लेकिन इसबार सत्ता का लुत्फ कुछ जुदा है। वजह साफ है बीएसपी को सरकार बनाने के लिए किसी बैसाखी की ज़रुरत नहीं पड़ी है। और वो सीना ठोक कर सरकार बना सकी है। उत्तर प्रदेश की कमान संभालते ही मायावती अपने ठेठ और सख्त अंदाज़ में दिखने लगी हैं। मायावती ने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद राज्य को भयमुक्त, अपराधमुक्त और भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के वादों को पूरा करने का संदेश दिया है। क्योंकि राज्य में फैली अराजकता और गुंडागर्दी के परेशान जनता के बीच मायावती इन्हीं मुद्दों को लेकर गयीं थीं। सत्ता संभालते के बाद मायावती ने अफसरों को भी चेतावनी दे दी है कि जो भी दोषी पाया जाएगा उसके ख़िलाफ़ सख्त कार्रवाई की जाएगी। इसके ताज़ा उदाहरण राज्य में हो रहे अधिकारियों के तबादले हैं। बीएसपी को पार्टी गठित होने के तेईस साल बाद पूर्ण बहुमत हासिल हुआ है। और ये सब मुमकिन हो सका है शोसल इंजीनियरिंग के नुस्खे की बदौलत। जिसे मायावती ने अपने कुछ भरोसेमंद और अनुभवी सिपहसलारों के साथ मिलकर इस चुनाव में आजमाया। ओम् बुद्धाय नमः का जाप करने वाली माया ने न सिर्फ बहुजन की विचारधारा को सर्वजन के फलसफे में बदला, बल्कि हाथी नहीं गणेश हैं...ब्रम्हा-विष्णु-महेश हैं...का नारा देकर समूचे सियासी समीकरणों को ही उलट-पलट दिया और राजनीतिक पंडितों के गणित को ग़लत साबित कर दिया। प्रदेश के राजनीतिक इतिहास में सोलह साल बाद किसी पार्टी को पूर्ण बहुमत हासिल हो सका है। मायावती का भारी भरकम हाथी सब पर भारी पड़ गया। मुलायम और अमर सिंह के दावे फुस्स हो गए और पंजाब, उत्तराखंड चुनाव परिणाम की बीजेपी की उम्मीदों का कमल मुरझा गाया। मायावती ने अपने बूते सत्ता की बागडोर हासिल कर ली है। चुनाव से पहले और चुनाव के दौरान मायावती ये कहती रही कि बहुमत हासिल करने की कूवत सिर्फ बीएसपी में है लेकिन उनकी बातों को जैसे किसी ने तवज्जो ही नहीं दी। हालांकि उन्हें सबसे बड़ी पार्टी ताक़त के रुप में उभरने वाली पार्टी के रुप में पेश किया जा रहा था लेकिन चुनाव में दिलचस्पी रखने वालों और मीडिया के लिए वो स्टार प्रचारक कतई नहीं थीं। जो लोग बीजेपी ओर कांग्रेस की पहेलियों में उलझे हुए थए उन्हें ये समझ में नही आ रहा कि मायावती ने इतनी बड़ी जीत कैसे हासिल कर ली।
उनके लिए तो राहुल गांधी किसी हीरो से कम नहीं थे और वे काग्रेस को पचास सीटें दिलवा रहे थे। लेकिन असलियत सामने है राहुल गांधी कांग्रेस के लिए कोई करिश्मा नहीं कर सके। ये पूरा चुनाव मायावती की कुशल राजनीति का निचोड़ साबित हुआ। स्वर्णों को साथ लेकर चलने की मायावती की रणनीति रंग लायी। मायावती का आकलन सही साबित हुआ कि बीएसपी पूर्ण बहुमत के साथ यूपी की सत्ता में आएगी।