Sunday, July 18, 2010

ये कैसी संस्कृति?

बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी की बदजुबानी को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी किस डगर पर जा रही है। गडकरी दिन-ब-दिन अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदियों के लिए अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं। खुद गडकरी और बीजेपी को ऐसे जुमलों पर फक्र महसूस होती है, इससे शर्मनाक बात भला और क्या हो सकती है?

संघ के आशिर्वाद से नितिन गडकरी जब बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने तो ऐसा लगा कि वह पार्टी के भीतर उस सभ्याता और संस्कृति को कायम करेंगे, जिसका संघ हिमयती रहा है। उम्मीद थी की बीजेपी संघ की बनाई पगडंडी पर चल निकलेगी। लेकिन देश की मुख्य विपक्षी पार्टी का मुखिया अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदियों के लिए जिस तरह के जुमलों का इस्तेमाल रहा है, उसे तो अब ये सवाल उठने लगा है कि क्या गडकरी इसी तरह की सभ्याता और संस्कृति के हिमायती हैं। नितिन गडकरी ने देहरादून में पार्टी की जनाक्रोश रैली में जिस तरह की अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल किया उसकी कल्पना कम से कम देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष से नहीं की जा सकती। रैली में कांग्रेस पर निशाना साधते हुए उन्होंने अफजल गुरु को कांग्रेस का दामाद कह डाला। अफजल के फांसी के मुद्दे पर गडकरी ने रैली में कहा , ' क्या अफजल कांग्रेस का जमाई है?' जो उसे फांसी नहीं दी जा रही है। अकसर नेता अपने बयान के बाद उस पर सफाई देने और खुद को बचाने की कोशिश में लग जाते हैं, लेकिन गडकरी ने तो ऐसा कुछ नहीं किया, बल्कि इस बयान के ठीक दूसरे दिन बीजेपी अध्यक्ष ने हा कि उन्होंने जो कुछ भी कहा वो ठीक कहा था, लिहाजा मांफी मांगने का सवाल ही नहीं पैदा होता। यानी गडकरी ने जिसतरह के शब्दों का इस्तेमाल किया था वो गलती से उनकी जबान से नहीं निकला बल्कि सोच-समझ कर और नाप-तोल कर बोले गए शब्द थे। इसके बाद गडकरी ने लखनऊ में एक दूसरी रैली में कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह को औरंगजेब की औलाद बताया। गडकरी पहले भी अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदियों के खिलाफ अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करते रहे हैं। कुछ ही समय पहले गडकरी ने चंडीगढ़ में एक जनसभा के दौरान लालू यादव और मुलायम सिंह यादव को ‘कुत्ता’ कहा था। चंडीगढ़ में जनसभा को संबोधित करते हुए गडकरी ने दोनों नेताओं को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के तलुए चाटने वाले की संज्ञा दे डाली। गडकरी ने राजनीति संघ के गर्भ में सीखी है। संघ ने बीजेपी में कई आला नेताओं को तरजीह देते हुए उन्हें पार्टी का अध्यक्ष बनाया था। ताकि संघ की विचारधारा को वो बीजेपी के माध्यम से आगे बढ़ाएं। लेकिन गडकरी जिस तरह की विचारधारा को परोस रहे हैं उसको लेकर इस बात का संदेह होने लगा है कि क्या ये संघ कि विचारधारा है या फिर गडकरी खुद ऐसे राजनीति के पैरोकार हैं। जिसमें गाली आम बात हो।

Thursday, July 23, 2009

क़ातिल पंचायत

कहते हैं पंच परमेश्वर होते हैं, लेकिन जातीय पंचायतों की तरफ से आने वाले फैसलों में पंच यमराज की भूमिका में नजर आते हैं। कभी जाति के नाम पर तो कभी गोत्र के नाम कातिल पंचायतें मौत का फरमान सुनाती है। जिंद और झज्जर के तालिबानी फैसले इसका नमुना भर हैं।...क़ैसर रज़ा
जिंद की पंचायत का फरमान लील गया वेद पाल को। वैसे तो उसके पास पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट का आदेश भी था....जिसमें सोनिया से उसकी शादी जायज थी....जिस पर जिंद की पंचायत ने पहले गोत्र की गोट फंसा दी थी। अदालत के फैसले से वेदपाल का हौसला बढ़ा.....वो अपनी बीबी को लेने अपनी ससुराल पहुंचा....पुलिस के कुछ जवान भी उसके साथ थे.......लेकिन पंचायत के आगे सब बेमानी हो गया। उसे पीट पीट कर मार डाला गया। वेदपाल की मौत से झज्जर का रविंद्र सहमा हुआ है। उसने भी अपने गोत्र की एक लड़की से शादी की है। पंचायत ने पहले शादी तोड़ने का फरमान सुनाया। जब रविन्द्र ने इससे इंकार कर दिया तब पंचायत ने उसे गांव से बेदखल करने का हुक्म दिया। पंचायत के फैसले से परेशान रविन्द्र ने जहर खा कर जान देने की कोशिश भी की। हरियाणा में गोत्र और परिवार के कथित सम्मान के नाम पर इस तरह की हत्याएं और पंचायती फरमान का सिलसिला काफी पुराना है। दूसरे राज्यों में भी जातीय पंचायतों का काफी दबदबा है। कोई पंचायत के फैसले के खिलाफ गया तो उसकी जान पर बन आती है। सरकार लगातार जाति पंचायतों के अस्तित्व को नकारती रही है लेकिन हकीकत सामने है। पंचायती फैसलों के आगे कानून और अदालत का कोई जोर नहीं चलता। दरअसल देश की ज्यादातर आबादी गांवों में रहती है। लोग कुनबे, जात-बिरादरी और कबीले में बटें हैं। पंचायत का फरमान इनके लिए सबसे उपर होता है। समाज और जातीय पंचायत मर्द-औरत की शादी को गोत्र के नाम पर कबूल करने को राजी नहीं है। वोट किसको देना है, प्यार किससे करें, शादी किससे करें, कौन बिरादरी में रहेगा, कौन नहीं- हर बात पर फतवा...फरमान। कदम कदम पर समाज के ठेकेदारों की मौजूदगी आम लोगों के हर काम में अडंगा लगाने को तैयार है। उन्हें लगता है कि बदलाव की एक बयार उनके समाज को उड़ा ले जाएगी। कभी कोई बाबू बजरंगी प्यार करने वालों को लाठी डंडों से समझाता है, कोई प्रमोद मुतालिक संस्कृति का हवाला देकर पब जाने वाली लड़कियों की पिटाई कराता है। कोई मौलाना फतवे के दम पर इस्लाम की दुहाई देता है, किसी गांव में पंचायत प्यार करने वालों को सूली पर चढ़ा देती है, कोई सरकार धर्म बदलने पर पाबंदी का कानून बनाती है। ऐसे में अब समलैंगिकों को कानूनी मान्यता देने की बात हो रही है। क्या समाज की मानसिकता इस नए बदलाव को कबूल कर पाएगी। बड़ा सवाल है। गांवों में पंचायती व्यवस्था लागू करने की मांग होती रही है। मगर पंचायती फैसलों के अनुभवों को देखते हुए पंचायती व्यवस्था का सापना कितना साकार हो पाएगा। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है।

Saturday, May 30, 2009

नस्लवाद का नासूर

पिछले कुछ दिनों से ऑस्ट्रेलिया में भरतीयों पर नस्लीय हमले हो रहे हैं। लिहाज अब भारत सरकार ने इस मसले को गंभीरता से लिया है। लेकिन ये कोई पहला मौका नहीं जब पश्चिमि देशों में रहे रहे भरतीयों के साथ नस्लीय भेदभाव का मामला सामने आया हो, बल्कि ऐसे मामलों की एक लंबी फेहरिस्त है। ...क़ैसर रज़ा

आज दुनिया ने ग्लोबल विलेज की शक्ल अख्तियार कर ली है। फिर भी पश्चिमि देशों की मानसिकता भारतीयों के प्रति नहीं बदली। आज भी भारतीयों के साथ नस्लभेद हो रह है। ऑस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों पर हुए ताजा हमले इस बात के उदहारण हैं। वहीं एक बार फिर फ्रांस एयरलाइन के 10 मुसाफिरों को नस्लवादी भेदभाव का शिकार होना पड़ा है। वॉशिंगटन से पैरिस होते हुए मुंबई आने वाले भारतीयों ने शिकायत की कि सोमवार को उनके हवाई जहाज के वाशिंगटन से देरी से पैरिस पहुंचने पर उन्हें लाउंज में ही थोड़ा पानी और एक सैंडविच देकर रखा गया। और उन्हें हवाई अड्डे पर ही रुकना पड़ा जबकि अमेरिकी पासपोर्ट वाले लोगों को ट्रांजिट वीजा देकर उन्हें ठहरने का इंजाम कराया गया और उनका खास ख्याल रखा गया। इससे पहले 12 मई को एयर फ्रांस से सफर करने वाले 50 से ज्यादा भारतीयों ने नस्लीय भेदभाव का आरोप लगाया था। पिछले दिनों जर्मनी के पूर्वी प्रांत सेक्सोनी में स्थानीय जर्मन युवकों ने भारतीयों के एक समूह की जमकर पिटाई कर दी। दरअसल कुछ भारतीयों की जर्मन से बहस हो गई और मारपीट की नौबत पैदा हो गयी। इसके तुरंत बाद वहां 50 जर्मन युवक जमा हो गए और उन्होंने भारतीयों को दौड़ा दौड़ा कर पीटा। और नस्लभेदी नारे लगाए। कुछ दिन पहले अफ्रीका में मिस इंडिया अफ्रीका के चुनाव के दौरान भी नस्लभेद कि बात सामने आयी थी। ब्रिटेन के एक रियलिटी शो बिग ब्रदर में भारतीय अभिनेत्री शिल्पा सेट्टी के साथ भी नस्लभेद का मामला सामने आय़ा था। मलेशिया में भी भारतीयों के साथ कई बार नस्लभेदी व्यवहार का मामला सामने आ चुका है। इसी साल 22 जनवरी को न्यूयॉर्क में तीन लोगों ने जसमीर सिंह नाम के एक सिख युवक पर हमला किया जिससे उसकी एक आंख में गंभीर चोट आई थी। 6 जून 2008 में भी न्यूयॉर्क के एक स्कूल में सिख छात्र को पीटने और जबर्दस्ती उसकी पगड़ी निकाल देने का एक मामला सामने आया था। इसी साल 18 मार्च को लंदन में गुरुद्वारा सिख संगत में आग लगा दी गई। आगजनी से एक हफ्ते पहले गुरुद्वारे की बाहरी दीवारों पर नस्ली नारे भी लिखे मिले थे। ऐसे कई मामले हैं जो पश्चिमि देशों की नस्लवादी मानसिकता को जहिर करते हैं।

जातिवाद का ज़हर

पिछले दिनों पंजाब जिस आग में जला उसकी चिंगारी विएना में नहीं भड़की बल्की ज्वालामुखी का ये लावा सदियों पुराना है। जातिवाद की आग तो बस गाहेबगाहे भड़कती रहती है। ...क़ैसर रज़ा

नफरत की ये चिंगारी यूं ही नहीं भड़की, बल्कि इस आग के पीछे जातिवाद का जहर घुला हुआ है। विएना में सिख गुरु की मौत की वजह से पूरा पंजाब धधक रहा है। हिंसा का लावा तब फूटा जब सिख समुदाय के एक वर्ग के लोगों ने विएना में डेरा सच खंड के अनुयायियों पर हमला बोल दिया। इस हमले में एक दलित सिख धर्मगुरु संत राम नंद की मौत हो गई। दरअसल डेरा सच्च खंड दलित सिखों का संगठन है। अमूमन ये माना जाता है कि सिखों में जतिवाद जैसी कोई बात नहीं है। लेकिन हकीकत ये है कि जतिवाद की खाई सिख समुदाय में काफी पुरानी है। डेरा सच खंड की स्थापना गुरु रविदास ने की थी। गुरु रविदास चौदवीं शताबदी के दलित जाति के गुरु थे। जिन्हें सवर्ण सिख गुरु नहीं मानते। कुछ जानकार डेरा सच खंड को सिख धर्म से अलग मानते हैं और इसे रविदास धर्म कहते हैं। लेकिन कई चीजे हैं जिनकी वजह से डेरा सचखंड को सिख समुदाय से अलग नहीं माना जा सकता है। डेरा सच खंड के लोग भी गुरु ग्रंथ साहिब में यकीन करते हैं। इस समुदाय के लोगों की दलील है कि रविदास वाणी यानी गुरु रविदास के श्लोक श्री गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल है लिहाजा इसकी चर्चा होनी चाहिए। सवर्ण और दलित सिखों के इसी गतिरोध का नतीजा है कि पूरा पंजाब नफरत की आग में जल रहा है। और इस संघर्ष की वजह से लाखों लोग प्रभावित हो रहे हैं। पंजाब में जनजीवन अस्त व्यस्त हो गया है। कई रेल गाड़िया रद्द कर दी गई हैं। पिछले दिनों राजस्थान समेत कई प्रदेश जातिवाद की आग में जले थे। जब गुर्जर औऱ मीणा समुदाय के बीच टकराव पैदा हुआ था। जातिवाद की ये आग किसी एक धर्म में नहीं बल्कि सभी धर्मों में मौजूद है। एकता की बात करने वाले ईसाई धर्म में भी दलित और गैर दलित की भावना कायम है। कई चर्चों में तो दलित ईसाईयों से गैर बराबरी का आलम ये है कि उनके बैठने के लिए अलग जगह, पीने के लिए अलग पानी का गिलास और दफन करने के लिए कब्रिस्तान भी अलग है। ऐसे में ब्राह्मणवादी व्यवस्था के कथित जुल्म का शिकार दलित धर्मपरिवर्तन करके भी दलित बने हैं। गोवा में जो ब्राह्मण ईसाई बने वो बामोन्न हो गए, छत्रिय चाटिम और वैश्य गोड्डोस के नाम से जाने जाते हैं। लेकि शूद्र से धर्म परिवर्तन करके ईसाई बने लोग शूरिद्रस ईसाई कहलाते हैं। केरल में भी हालात ऐसे ही है। इस्लाम धर्म में भी एकता की बात होती है। इस्लाम की बुनियद भी बराबरी के बिना पर कायम हुई। इसी लिए कहा गया है कि एक ही सफ में सब खड़े हो गए महमूदो आयाज, ना कोई बंदा रहा ना कोई बंदा नवाज लेकिन हकीकत ये है दूसरे धर्मों की तरह देश में मुस्लिम समाज भी जात बिरादरी में बंटा हुआ है। ऐसे में जातपात की ये दिवार अबतक खत्म नहीं हुई और गाहे बगाहे नफरत का मंजर हमारे सामने आ जाता है।

Wednesday, April 22, 2009

नक्सलवाद और लोकतंत्र

जब से चुनाव का मौसम आया है नक्सली वारदातों में इजाफा हो गया है। साठ के दशक में जिस मकसद से व्यवस्था विरोधी मुहिम छेड़ी गई थी, अब वो कई गुम सा हो गया है। नक्सलवाद का मकसद सरकार के समानांतर सत्ता स्थापित करना, हिंसा और आतंक फैलाना हो चला है। ...............क़ैसर रज़ा

1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से निकली चिंगारी ने, आज इतनी ताकत बटोर ली है कि वो सीधे सत्ता के प्रतिष्ठानों पर हमले करने लगी है। पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले में नेपाल सीमा से लगे एक छोटे से स्बे में जिस संघर्ष का बिगुल फूकां गया, उसका मकसद किसानों को उनका हक दिलाना था। असमानता और अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद करना था। उस वक्त कानू सान्याल ने कहा था कि सशस्त्र संघर्ष जमीन के लिए नहीं, राजसत्ता के लिए। लेकिन आज नक्सलवाद अपने मकसद से भटक गया है। उसके लिए राजसत्ता के मायने बेमानी हो गए हैं। वो लोकतंत्र के माहापर्व में हिस्सा लेने को तैयार नहीं है। उसे तो इस दिन खून की होली खेलना पसंद आन लगा है। नक्सली पिछले कई सालों से चुनाव बहिष्कार कर रहे हैं। यही वजह है कि चुनाव वक्त नक्सली वारदातों में इजाफा हो जाता है। इसबार भी जब से चुनावी मौसम आया है नक्सलियों ने हमले तेज कर दिए हैं। नक्सली हर बार चुनाव बहिष्कार करते हैं। जब चुनावों का मौसम होता है तब नक्सली दीवारों पर चुनाव बहिष्कार से जुड़े नारे लिखे जाते हैं। पर्चे बांट कर जनता से चुनाव बहिष्कार करने को कहा जाता है। इन पर्चों और पोस्टरों में ये धमकियां दी जाती हैं कि अगर किसी ने वोट देने की कोशिश की तो उसकी खैर नहीं। कई बार तो वोट देने वाले के अगूंठे और हाथ काट दिए जाने के मामले सामने आते रहे हैं। नक्सलियों और उग्रवादियों व अलगाववादियों में कोई फर्क नहीं है। जम्मूकश्मीर में अलगाववादी संगठन भी चुनाव का बहिष्कार करते रहें हैं। जबकि उत्तर पूर्व के राज्यो में कई उग्रवादी संगठन लोगों को चुनाव से दूर रहने की हिदायत देंते हैं। जबकि नक्सली भी उसी काम को करने में लगे हैं। हालांकि कुछ जानकारों का तर्क है कि अलगाववादी और उग्रवादियों की मंशा देश विरोधी होती है, जबकि नक्सली ऐसा नहीं करते। लेकिन हकीकत ये है कि अगर लाल गलियारा पूरी तरह वजूद में आ गया तो वो देश को कई टुकड़े में बांट देगा। नक्सलवाद का दायरा दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा है। केन्द्रीय गृहमंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक देश के पचपन से ज्यादा जिलों में नक्सलवाद ने अपने पांव फैला रखे हैं। जबकि गैर सरकारी संगठनों के मुताबिक नक्सलियों की पकड़ 132 जिलों में है। ये रेडकोरिडोर बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, झारखेड उड़ीसा, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु तक फैल गया है। आज सरकार के समानांतर नक्लियों की सत्ता चल रही है। इन्हें लोकतांत्रिक व्यवस्था में यकीन नहीं है। मौजूदा नकस्लवाद की मंशा गरीबों, मजलूमों और पिछड़ों को उनका हक दिलाने की नहीं बल्कि आतंक फैलाने की है।

Tuesday, April 7, 2009

लोकतंत्र में जूता

नई दिल्ली में कांग्रेस मुख्यालय में वित्तमंत्री पी चिदंबरम की प्रेस कांफ्रेस में जो कुछ भी हुआ उसे कहीं से सही नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन इराक से लेकर, ब्रिटेन और अब हिन्दुस्तान तक इस तरह की परंपरा शुरू हो गई है। लेकिन बेचारा इसमें जूते का क्या दोष। जूता तो हर मौके पर अपनी वफादारी का सबूत देता है। यही वजह है कि जूते की महिमा हमेशा रही है। चाहे वो पैर में हो या सिर पर। काफी दिनों बाद शेखर आनंद जी ने मेरा वतन के पाठकों के लिए ये पाती भेजी है। पेश है...
जूता बहुत सहनशील होता है। वो सर्दी गर्मी बरसात के अलावा भी बहुत कुछ सहता है। शो रुम में किसी की पसंद ना पसंद को सहता है...........पुराना हो जाये तो अपनों की उपेक्षा को सहता है। वो किसी के शरीर का दबाव सहता है......राह की रोड़ी गिट्टी की रगड़ सहता है.....पैर पटकती कुंठा को सहता है.......लोगों की भीड़ में जाने अनजाने टकराव सहता है.....जमाने भर की गर्दो गुबार सहता है........जूता... मंदिर, मस्जिद,गिरजा,गुरद्वारे के बाहर अपने तिरस्कार को सहता है। सब कुछ सहते सहते अगर जूता फट भी जाये तो भी वफादार रहता है......वो आखिर तक पैर में पड़ा रहता है......लेकिन अगर इंसान के सब्र का पैमाना छलक जाये तो वो जूता पैर से निकाल लेता है और बिना कुछ कहे सामने वाले को छील काट कर रख देता है। जूता सब कुछ जानता है......इसलिये आखिर तक ईमानदार बना रहता है। जूते को पता है कि उसकी जरुरत बेइमान और ईमानदार दोनो को है। इसलिये पैर किसी का भी हो वो अपनी छाप छोड़ता चलता है। जूता ही नहीं... जूते के निशान भी इंसाफ पसंद होते हैं। गुनहगार को गुनाह के बाद अपने ही जूते के निशान साफ करने होते हैं.....जरा सी चूक गुनहगार को जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा सकती है। देश आजाद है लेकिन जूता नहीं। वो अतीत के अपने ही निशान खुद नहीं मिटा सकता... इसलिये आजाद भारत में सीबीआई मौजूद है.....जो जरुरत से ज्यादा स्वतंत्र नेताओं के जूतों के निशान साफ करती है। दंगा चाहें चौरासी का हो....गोधरा या गुजरात का......राममंदिर का आंदोलन हो....या ताज का कारीडोर.......जहां जहां नेताओं के कदम पड़े हर जगह सीबीआई को जूते के निशान मिटाने का जिम्मा मिला। निष्पक्ष का तमगा लिये सीबीआई केन्द्र सरकार के सापेक्ष ही काम करती है। कब, कहां, कैसे, किसका, कितना निशान मिटाना है इसे केन्द्र की सरकार और काफी हद तक देश का गृहमंत्री आंकता रहता है। हिसाब किताब में माहिर चिदम्बरम की गणित यहीं गड़बड़ा गयी। उम्र की एक दहलीज पर खड़ा जूता जानता था कि उसकी उम्र खत्म हो सकती है लेकिन अदालत में मामला नहीं। अपनी सफेद बनावट पर कुछ काले निशान लिये ये जूता.... बहुत खामोशी से पैर से निकला.....हाथ से छूट कर हवा के रास्ते चिदम्बरम की तरफ बहुत खामोशी से लपका और गिरने के बाद भी खामोश है। जूते की इसी खामोशी के पीछे बहुत बड़ा तूफान है। आम जनता के जस्बातों का तूफान........इंसाफ की डगर पर नाइंसाफी के डर का तूफान.........जरुरत से ज्यादा स्वतंत्र नेताओं को सबक सिखाने का तूफान......सरकारी महकमों में दलालों के सफाये का तूफान........बदलाव के वक्त सिर्फ बदलाव का तूफान। बेहतर है कि सफेद कपड़ों में कालिख लिये चेहरे....अब भी.... जूते की भाषा समझ लें। जूता सहनशील है इसलिये फिर मौका दे रहा है।

Friday, March 27, 2009

मुद्दा विहीन बीजेपी

बीजेपी ने चुनाव तारीखों के एलान से काफी पहले ही लालकृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया था, लेकिन चुनावी रणभेरी बजने के इतने दिनों बाद भी बीजेपी ने अपना घोषणा पत्र जारी नहीं किया है। आखिर इस देरी के पीछे असल वजह क्या है ? आईए जानते हैं।...

सत्ता पाने को आतुर बीजेपी ने अबतक अपना चुनावी घोषणा पत्र जारी नहीं किया है। दरअसल बीजेपी के पास मुद्दों का टोटा है। बीजेपी अब तक ये तय नहीं कर पाई है कि वो किन मुद्दों के साथ चुनावी समर में कूदे। और किन मुद्दों के बिना पर वो कांग्रेस को घेरे। बीजेपी की रणनीति आतंकवाद, महंगाई और राम मंदिर मुद्दे के आसपास भटकती दिखाई दे रही है। इन बड़े मुद्दों के होते हुए भी वो असमंजस में है। पिछले दिनों नागपुर में हुए पार्टी अधिवेशन के दौरान राजनाथ सिंह ने संकेत दिए थे कि बीजेपी राममुद्दे को चुनावी मुद्दा बना सकती है। लेकिन बीजेपी इस मुद्दे के जरिए लोगों को कई बार से बरगलाती आई है। उसे पता है कि काठ की हांडी चूल्हे पर बार-बार नहीं चढ़ती। यही वजह है कि वो राम बाण के इस्तेमाल से बच रही है। जबकि बीजेपी पर सहयोगी दलों का दबाव भी है, खासकर जेडीयू ने साफ कर दिया है कि राममंदिर, धारा 370 और समान नागरिक संहिता का मुद्दा एनडीए के एजेंडे में नहीं है। बीजेपी राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद का मुद्दा उठाने में भी संकोच करती दिखाई दे रही है। क्योंकि संसद हमला, लालकिला हमला, कंधार विमान हाइजैकिंग और अक्षरधाम मंदिर हमले जैसे मुद्दों के जरिए वो खुद कटघरे में खड़ी दिखई देने लगती है। मंहगाई को बीजेपी मुद्दा बना सकती थी, लेकिन कमबख्त महंगाई दर भी काफी नीचे चली आई है, ऐसे में इसका भी फायदा बीजेपी को शायद ही मिल पाए। कांग्रेस ने कर्ज माफी कर किसानों की कर्ज माफी का मुद्दा भी बीजेपी से छीन लिया है। बीजेपी खुलकर परमाणु करार की खामिया भी नहीं गिना रही, क्योंकि उसकी और कांग्रेस की विदेश नीति में कोई खास फर्क नहीं है। और अगर वो भी सत्ता में होती तो यही करती जो कांग्रेस ने किया। यही वजह है कि बीजेपी ये कह कर परमाणु करार को मुद्दा नहीं बना रही है कि समझौता आम आदमी की चिंताओं से कोसो दूर है। ये तमाम ऐसे पेंच है जो बीजेपी के सामने मुश्किलें पैदा कर रहे हैं। ऐसे में बीजेपी किन मुद्दों के जरिए जनता के बीच जाए वो अब भी दुविधा में है।